श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक के व्यंग्य”  में हम श्री विवेक जी के चुनिन्दा व्यंग्य आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं. अब आप प्रत्येक गुरुवार को श्री विवेक जी के चुनिन्दा व्यंग्यों को “विवेक के व्यंग्य “ शीर्षक के अंतर्गत पढ़ सकेंगे.  आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का व्यंग्य  “संभालिये अपना …… ”.  श्री विवेक रंजन जी का यह  सामयिक व्यंग्य  हमें आतंक और आतंकियों के बारे में नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर करता है। साथ ही यह भी कि आतंक के प्रतीक के अंत की कहानी क्या होती है और यह भी कि आतंक कभी मरता क्यों नहीं है ? श्री विवेक रंजन जी ऐसे बेबाक  व्यंग्य के लिए निश्चित ही बधाई के पात्र हैं.  )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक के व्यंग्य – # 19 ☆ 

☆ संभालिये अपना …… ☆

ब्रेकिंग न्यूज़ में घोषणा हुई कि आतंकी सरगना मारा गया, दुनियां भर में इस खबर को बड़ी उत्सुकता से  सुना गया. सरगना आतंक का पोषक था. पहले भी उसे मारने के कई प्रयास हुये. हर बार उसे मारने की गर्वोक्ति भरी घोषणायें भी की गईं, किन्तु वे घोषणायें गलत निकलीं. सरगना  फिर से किसी वीडीयो क्लिप के साथ अपने जिंदा होने के सबूत दुनिया को देता रहा है, पर इस बार डी एन ए मैच कर पुख्ता सबूत के साथ उसके मौत की घोषणा की गई है, तो लगता है कि सचमुच ही सरगना मारा गया है. सरगना की मौत की पुष्टि के लिये डी एन ए मैच करने के लिये उसका अंतरवस्त्र चुरा लिया गया था. इस घटना से दो यह  स्पष्ट संदेश मिलते हैं पहला तो यह कि सबको अपना अंतरवस्त्र संभाल कर ही रखना चाहिये. और दूसरा यह कि घर का भेदी लंका ढ़ाये यह तथ्य राम के युग से लेकर आज तक प्रासंगिक एवं शाश्वत सत्य है. विभीषण की मदद से ही राम ने रावण पर विजय पाई थी. सरगना के विश्वसनीय ने ही उसका अंतरवस्त्र अमेरिकन एजेंसियो को सौंपा और मुखबिरी कर उसे कुत्ते से घेर, कुत्ते की मौत मरने के लिये मजबूर कर दिया.

यूं यह भी शाश्वत सत्य है कि आतंक का अंत तय है देर सबेर हो सकती है. बड़े समारोह के साथ रावण वध तो हर बरस किया  जाता है, पर फिर भी रावणी वृत्ति जिंदा बनी रहती है. यही कारण है कि कितने भी आतंकी सरगना मार लें पर आतंक जिंदा है. जरूरत है कि जिहाद की सही व्याख्या हो, इस्लाम तो सुकून, तहजीब और मोहब्बत का मजहब है, उसकी पहचान आतंक के रूप में न बने इस दिशा में काम हों.

यूं आतंकी सरगना के बार बार मारे जाने की खबरो और रावण के हर बरस मरने या यूं कहें कि राक्षसी वृत्ति के अमरत्व को लेकर दार्शनिक चिंतन किया तो लगा कि ये भले ही बार बार मर रहे हों पर हममें से ना जाने कितने ऐसे हैं जो हर दिन बार बार मरने को मजबूर हैं, कभी मन मारकर, कभी थक हारकर. कभी मजबूरी में तो कभी समझौते के लिये आत्मा को मारकर लोग जिंदा हैं. कोई किसान कर्ज के बोझ तले फसल सूख जाने, या बाढ़ आ जाने पर हिम्मत हारकर फांसी पर लटक जाता है तो कोई प्रेमी प्रेयसी की बेवफाई पर पुल से नदी की गहरी धारा में कूद कर आत्म हत्या कर लेता है. कोई गरीब बैंक या फाईनेंस कम्पनी के डूब जाने पर खुद को लुटा हुआ मानकर जीवन से निराश हो जाता है. दुर्घटना में मरने पर सरकारें सहायता घोषित करती हैं, जाने वाला तो चला जाता है पर वारिसो का भविष्य संवर जाता है, परिवार के किसी सदस्य को सरकारी नौकरी मिल जाती है, मौत का मुआवजा मिल जाता है, गरीबी रेखा के बहुत नीचे से परिवार अचानक उछल कर पक्के मकान तक पहुंच जाता हैं.

वैसे सच तो यह है कि जब भी, कोई बड़ी डील होती है, तो कोई न कोई, अपनी थोड़ी बहुत आत्मा जरूर मारता है, पर बड़े बनने के लिये डील होना बहुत जरूरी है, और आज हर कोई बड़े बनने के, बड़े सपने सजोंये अपने जुगाड़ भिड़ाये, बार-बार मरने को, मन मारने को तैयार खड़ा है, तो आप आज कितनी बार मरे? मरो या मारो! तभी डील होंगी। देश प्रगति करेगा, हम मर कर अमर बन जायेंगे. बड़ी बड़ी डील में केवल कागजी मुद्राओ का ही खेल नही होता, हसीनाओ की मोहक अदाओ और मादक नृत्य मुद्राओ का भी रोल होता है. सुरा और सुंदरी राजनीति व व्यापार में हावी होती ही हैं इसलिये डी एन ए से पहचान और अदृश्य कैमरो से बन रही फिल्मो के इस जमाने में अपना यही आग्रह है कि  अपना अंतरवस्त्र संभालिये वरना आपको कई कई तरह से कई कई बार मरना पड़ेगा.

 

विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर .

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments