श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मीठे की हद-शहद ।)

?अभी अभी # ८०४ ⇒ आलेख – मीठे की हद-शहद ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

निदा फ़ाज़ली इस दुनिया को जादू का खिलौना कहते हैं। कोई कहता है, दुनिया है सराय, रहने को हम आए तो उधर शैलेंद्र शिकायत करते हैं, दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई ! जगत कहें अथवा कुदरत, लेकिन इसे इंसान ने तो नहीं बनाया।

किसान खेत में गन्ना उगाता है, हम घर में बैठे बैठे शर्बत बनाते हैं। शर्बत में चीनी होती है, हम कम ज्यादा कर सकते हैं। किसान गन्ना उगा सकता है, शकर नहीं। वह खेत की मिट्टी में सिर्फ खाद पानी डालता है, कोई शर्बत नहीं, फिर भी गन्ना मीठा पैदा होता है। यह कुदरत का करिश्मा भी किसी जादू से कम नहीं। लेकिन इंसान कर्ता बन इसका भी श्रेय ले लेता है।।

कुदरत में केवल मिठास ही नहीं, सभी रंग भी व्याप्त हैं और खुशबू भी। सागर में मोती भी है और पृथ्वी के गर्भ में खनिज का भंडार भी। पांच तत्वों से बना यह शरीर भी कुदरत की ही देन है और अंत में इसे भी मिट्टी में ही मिल जाना है। किसी के लिए यह मनुष्य जीवन माया है, मिट्टी की काया है, तो किसी के लिए सोने से भी अधिक अनमोल, ईश्वर की दया माया है, उसी की छत्र छाया है ;

माटी के पुतले,

इतना न तू कर गुमान।

पल भर का तू मेहमान ;

यह बुद्धिमान मनुष्य प्रकृति का दोहन कर कभी यहां का राजा बन बैठता है तो कभी मालिक। ईश्वर की तरह उसकी भी सत्ता है, उसके भी नौकर चाकर दास और गुलाम हैं। उसका बस चले, तो स्वर्ग धरती पर ही उतार ले। वैसे भी जननी जन्मभूमि को स्वर्ग से भी अधिक महान ही माना गया है और देवता भी इस धरती पर जन्म लेने के लिए कतारबद्ध बैठे रहते हैं।

देव भी यहीं दानव भी यहीं, यहीं कोई मानव तो कोई महामानव।

मनुष्य के अलावा अन्य सभी प्राणी यहां अकर्त्ता बनकर कर्म करते हैं।

हमारी मां सिर्फ इंसान के बच्चे को दूध पिलाती है, लेकिन हम तो गाय, भैंस और बकरी का भी दूध पी जाते हैं। दूध, मलाई, मक्खन और मावा भी पका पकाया।

कपास के पौधे से रुई और जंगल की लकड़ी से हमने कपड़ा और मकान बना लिए और खेत में अनाज बो, अपनी रोटी का प्रबंध भी कर लिया। हमारे आलीशान महल और बंगले , सोना, चांदी और हीरे जवाहरात भी हमें इस पृथ्वी की गोद से ही मिले हैं, हम कोई दहेज में नहीं लाए। हां लेकिन इतना दिमाग पृथ्वी के अन्य प्राणियों के पास कहां।।

जीव: जीवस्य भोजनम् से ही प्रकृति का संतुलन है।

क्या आपको नहीं लगता ईश्वर ने मुर्गी का अंडा और जल बिन मछली सिर्फ इस इंसान के लिए ही बनाई है। जंगल में तो खैर जंगल राज है लेकिन हम तो जंगल भी बर्बाद करने पर तुले हैं। आज हर पहाड़ की चोटी और सभ्यता की चोटी पर भी यह मानव ही विराजमान है। चंद्रमा के बाद बस अब शीघ्र ही मंगल पर भी प्रवेश है।

नदियां न पीयें कभी अपना जल, वृक्ष ना खाए कभी अपना फल। एक मधुमक्खी बड़े जतन से फूलों से गंध और पराग चुराती है और अपने छत्तों में शहद बनाती है। चतुर मनुष्य मधुमक्खी को भी पाल लेता है, शहद शहद चाट लेता है। मीठे की हद है शहद। क्या आपने कभी शहद में शकर घोली है ?

रेशम का कीड़ा हमारे लिए रेशम तैयार करता है। कीड़े मकोड़े इतना काम करते हैं, फिर भी कहलाते हैं मक्खी और कीड़े मकोड़े ही। अजब तेरी कारीगरी रे करतार।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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