श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य – आतंक केवल अपनों का होता है।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२६ ☆
☆ व्यंग्य – आतंक केवल अपनों का होता है ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
(कभी आपको महसूस हुआ है डर का आतंकवाद)
जब भी मैं आतंकवाद का नाम सुनता हूँ, तब अंदर तक काँप जाता हूँ। मुझे अपने साथ हुए आतंकवादी हादसे याद आ जाते हैं। भले ही सेना के एक नायक ने कहा है कि यह ताजुब नहीं है कि तीन आतंकवादियों ने सीधे 26 लोगों को गोली से खून कर मार डाला! कारण स्पष्ट है कि हम कोई प्रतिकार नहीं करते हैं।
वे कहते हैं कि कई सैनिक लड़ाई में जब साफ टारगेट नहीं होते हैं तब वे प्रतिरोध के कारण 20-25 गोलियां खाने (लगने) के बावजूद जिंदा बच जाते हैं। उनकी यह बात याद आते ही मुझे मोहम्मद गौरी का आक्रमण याद आ जाता है। जिसने कुछ लोगों के बल पर हमारे मंदिरों को लूट लिया था। जबकि उसे देखने वाले यदि उसके सैनिकों पर कूद पड़ते तो सबके सब मारे जाते।
मगर तभी मुझे अपनी स्थिति का स्मरण हो आता है। भले ही सेनानायक ने उक्त बात कही हो, मगर मैं स्वयं भी इस आतंकवाद का शिकार रहा हूँ। चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया हूँ। क्योंकि मेरी मानसिकता ही ऐसी बनी हुई है। चाहूँ तो भी कुछ नहीं कर पाता हूँ। इस बात को मेरा लड़का अच्छी तरह जानता था।
उसे पता था कि पापा को आतंकवाद कब दिखाना है? इस कारण वह अपनी एक माँग को हमेशा तैयार रखना था। जब कभी घर में कोई मेहमान आते वह इस एक माँग को पूरी करने की जिद करने लगता। मैं मना करता तो वह उन मेहमानों के सामने धूल मिट्टी में लौटने लगता। इस कारण मेहमानों को आगे मैं उसके आतंकवाद से हमेशा त्रस्त हो जाता। फलस्वरुप उसकी माँग पूरी करना पड़ती।
मगर एक दिन मैंने सोच लिया था कि उसके आतंकवाद को अब चलने नहीं दूंगा। इससे मुक्त होकर रहूँगा। इसलिए अपने एक खास मित्र को मैंने मेहमान के तौर पर आमंत्रित किया। लड़के ने फिर आतंकवाद मचाया। मगर, मैंने सोच लिया था कि उसके आतंकवाद से मुक्ति पाकर रहूँगा। इसलिए मैं जमीन पर बैठकर उसको मारने की कोशिश करने लगा। ताकि उसके गाल पर थप्पड़ लगा सकूं।
मगर, शायद उसने सेनानायक का उक्त कथन पढ़ रखा होगा। वह तीव्र गति से इधर-उधर लौटकर रोने लगा। मैं थप्पड़ लगाने के लिए गाल ढूंढ रहा था। मगर उसका शरीर व गाल स्थिर नहीं था। इस कारण गाल पर मारने की कोशिश करता तो थप्पड़ कभी पांव पर लग जाता, कभी हाथ पर। यह देखकर मैं समझ गया कि इस फुर्तीले लड़के को मैं गाल पर थप्पड़ नहीं मार सकता। तब यह सोचकर मैंने उसके पैर पकड़कर उसे धर दबोचा कि इसकी मरम्मत करके रहूँगा।
जैसे ही मैंने उसे घर दबोचा, मित्र आ पहुंचा। वह आतंकवादी पुत्र मेरे काबू में आ गया था। यह देखकर मेरा शेर दिल कलेजा फूलकर कूंपा हो गया। मगर, तभी मेरी पत्नी यानि शेरनी आ पहुंची। वह आते ही बोली कि यह क्या करते हो? मेरे लाडले को मार डालोगे क्या?
यह सुनते ही वह लाडला फिर आतंकवादी बन गया। यह देखकर मेरे हाथ पांव फूल गए। मैं समझ गया कि शेर, शेरनी के सामने, मोर, मोरनी के सामने, बड़े से बड़ा डाकू, अपनी पत्नी के सामने, क्यों नाचने लगता है? तब मुझे लगा कि काश मैं भी अपनी पत्नी और बच्चों से कुछ गुर सीख पाता। ताकि इस आतंकवाद से मुक्त हो सकता।
तभी मुझे एक घटना याद आ गई। जब मुझे शिक्षक ने प्रेरित किया था। उन्होंने कहा था कि बोलने वाले की गुठली बिक जाती है, नहीं बोलने वालों के आम पड़े रह जाते हैं। इसलिए तुम्हें मंच पर बोलना पड़ेगा। तब मैं उनका आदेश पाकर रटा रटाया, पूरा भाषण याद करके मैं मंच पर चला गया। मगर जब हाल में हजारों लोगों की भीड़ देखी तो मुझ पर डर का आतंकवाद हावी हो गया। मेरी बोलती बंद हो गई। थरथर कांपने लगा। सब रटा रटाया दिमाग से गायब हो गया। मैं चुपचाप मंच से वापस भाग कर आ गया।
तब पहली बार मुझे पता चला की डर का आतंकवाद क्या होता है? यह हर एक व्यक्ति को सताता है। इसमें आपको भी सताया होता। इसका उपचार आपने भी ढूंढा होगा। यदि आपको इसका उपचार मिल जाए या मालूम हो जाए तो मुझे अवश्य बताइएगा। ताकि मैं भी अपने डर के आतंकवाद से मुक्त हो सकूं।
© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
03/05/2025
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