हेमन्त बावनकर
☆ लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆
☆ (१) देट साइड ऑफ़ स्क्रीन (२) दिया, बाती और तेल ☆
(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)
मराठी अनुवाद : सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे 👉 ☆ दोन अनुवादित कथा – (१) ‘स्क्रीनच्या अलीकडे.. पलिकडे‘ (२) ‘दिवे, वाती आणि तेल’ ☆
☆ देट साइड ऑफ़ स्क्रीन ☆
अक्सर होता तो यही था कि जब भी कोई विशेष अवसर या त्यौहार होता तो सेवकराम जी और उनकी धर्मपत्नी अनुराधा जी अपने बच्चों के साथ विडियो कांफ्रेंस कॉल कर उस अवसर या त्यौहार का आनंद ले लेते थे. जन्मदिवस किसी का भी हो मोबाईल के सभी स्क्रीन्स पर एक-एक केक होता. एक साथ सभी केक काटे जाते और जन्मदिवस मनाया जाता.
इस बार दीपावली पर्व पर उनके बेटे का विदेश से विडियो कॉल आया. स्क्रीन के दूसरी ओर उनके बेटे बहू के साथ ही उनका आठ साल का बड़ा पोता और दूसरा पोता जो कुछ ही महीनों में दो साल का होने जा रहा था बड़ी उत्सुकता से दीपावली की पूजा देखने लगे. बड़ा पोता कुछ समझदार था और यह सब पहले भी देख चुका था, किन्तु, छोटे पोते को यह सब बड़ा विचित्र लग रहा था. सेवकराम जी ने उन सभी को घर के आसपास के रंगबिरंगी रोशनी से जगमगाते हुए परिदृश्य को दिखाया. छोटा पोता देव बड़े कौतुहल से यह सब देख रहा था. जैसे ही उन्होंने उसे फुलझड़ियाँ जलाते बच्चे और पड़ोस के लोगों को आतिशबाजी करते हुए दिखाया तो देव की आँखों में कौतुहलवश अद्भुत चमक दिखाई दी. वे अकस्मात ही देव से बोले – “Next year we all will celebrate Diwali in India.”
देव थोड़ी देर चुप रहा. फिर अत्यंत कौतुकता से दिवाली की रंगबिरंगी जगमगाती रोशनी और आतिशबाजी देखते हुए उनसे बोला – “No Grandpa.. I would like to come to that side of screen just now..”
वह स्क्रीन के इस ओर आने की जिद के साथ रोने लगा. सेवकराम-अनुराधा और बेटा-बहू असहाय एक दूसरे की ओर देखते रह गए और थोड़ी ही देर में विडियो कॉल कट गया.
☆ दिया, बाती और तेल ☆
पुन्य सलिला नदी के तट, जिन्हें आज कल रिवर-फ्रंट कहते हैं, देखते ही बनते हैं. सेवकराम जी अक्सर प्रातःकाल पास के बगीचे में और कभी कभी शाम के समय उसी रिवर फ्रंट पर अपने समवयस्क वरिष्ठ नागरिक मित्रों के साथ टहलने चले जाया करते हैं.
नदी के तट अब पहले जैसे प्राकृतिक नहीं रह गए. सुन्दर हरे भरे तटों का स्थान अब सपाट पार्क / मैदान और कंक्रीट की चौड़ी सडकों ने ले लिया है. पुण्य सलिला नदी के तट के प्राचीन मंदिर से मुख्य सड़क तक तीर्थ यात्रियों/पर्यटकों के लिए वाणिज्यिक कॉरिडोर बन गया था. मंदिर के सामने नदी के तट की सीढ़ियों पर अब संध्या की विशाल आरती होने लगी थी.
समय के साथ हो रहे परिवर्तन को स्वीकार करना चाहिए ऐसा सभी का मानना है.
प्रतिदिन प्रातः और संध्या वेला में दिया बाती लगभग सभी घरों में एक अध्यात्मिक एवं सकारात्मक उर्जा प्रदान करता है. नदी के दोनों ओर बसे घर-मंदिरों के दीपक और कृत्रिम तथा आधुनिक विद्युत् प्रकाश से जगमगाने लगते हैं. नदी के तट पर बैठ कर नदी की लहरों पर इस झिलमिलाते हुए प्रकाश को देखने का अपना ही आनंद है.
सोशल मीडिया और स्थानीय समाचार पत्रों के माध्यम से पता चला कि इस बार रिवर-फ्रंट पर लाखों की संख्या में दीप जलाकर विश्व रिकॉर्ड बनाने की तैयारियां चल रही है. हरिलाल भाई काफी जिद कर रहे थे कि हमें इस वेला का साक्षी बनने का अवसर हाथ से नहीं छोड़ना चाहिए. रात्रि दस से ग्यारह बजे के मध्य इस कार्यक्रम को संपन्न होना था और तब तक लोग घर की पूजा भी संपन्न कर ही लेते हैं.
तय समय पर हरिलाल भाई और सेवकराम जी नदी तट पर पहुँच गये. सुरक्षा व्यवस्था काफी चाक-चौबंद थी. काफी भीड़ थी. कई लोग स्वेच्छा से अपनी सेवायें दे रहे थे. छोटे छोटे समूह में आयोजकों ने दीपकों को सजाकर रखा था. तय समय पर दीप प्रज्वलित किये गए. साथ ही आकाश में ड्रोन कैमरे प्रकट हो गए. उन्होंने उन लाखों दीपकों के विभिन्न कोणों से विडियो और चित्र लिए और थोड़ी ही देर में विश्व रिकॉर्ड बनने की घोषणा की गई. इसी के साथ ही जयघोष प्रारंभ हो गया और कार्यक्रम के संपन्न होने की घोषणा भी हो गई.
हरिलाल भाई और सेवकराम जी ने भी आपस में एक दूसरे को इस क्षण के साक्षी होने के लिए बधाई दी. वे वापिस जाने के लिए दीपकों के समूह के बीच से जाने को तत्पर हुए तो वहां का दृश्य देख कर सन्न रह गए.
समय के साथ ही दीपक बुझने लग गए थे और तट की सुरक्षा व्यवस्था के हटते ही कुछ नर नारियों और बच्चो का हुजूम दीपकों पर टूट पड़ा. वे अपने साथ लाए गए पोलिथीन की थैलियों में दीयों का तेल उड़ेल रहे थे.
सेवकराम जी और हरिलाल भाई एक दूसरे को हतप्रभ देखने लगे.
विश्व रिकॉर्ड बन चुका था. पॉलिथीन की थैलियों में दीयों का तेल भरने वाले नर नारियों बच्चों को विश्व रिकॉर्ड से कोई लेना देना नहीं था. शायद इस तेल से उनके घरों में कुछ दिनों का खाना बन जायेगा. आसपास का उमंग भरा वातावरण शोरगुल में खो चुका था और ड्रोन विडियो और चित्र लेकर अपने कैमरामेन की ओर वापिस जा रहे थे.
© हेमन्त बावनकर
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







दोनों लघुकथा बहुत अच्छी है। आज के समय में ऐसे बिंदुओं पर चिंतन आवश्यक है ।
वाह बहुत बढ़िया सेवक रामकी लघुकथाएं बहुत अच्छा संदेश देती है।
भाई, सेवाराम आपके सांसो से निकलकर पाठकों के दील में जगह बना रहा है, बधाई हो
दोनों लघुकथाएँ अत्यंत मार्मिक हैं।
दोनों लघुकथाएं प्रभावशाली मार्मिक हैं बधाई।