डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘मानव शरीर के फालतू अंग ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०९ ☆
☆ व्यंग्य ☆ मानव शरीर के फालतू अंग ☆
कुछ दिनों से ख़बर गर्म थी कि बाबा जी ने परलोक के साथ ‘हॉटलाइन’ स्थापित कर ली है और देवताओं से उनकी रोज़ बातचीत होती है। उनका कहना है कि चित्रगुप्त जी से उनका हंसी- मज़ाक भी हो जाता है और अगर कोई भक्त चाहे तो वे स्वर्ग में ‘रिज़र्वेशन’ के लिए उसकी सिफारिश कर सकते हैं।
ऊपर वालों के साथ बाबा के रसूख के बारे में सुनकर उनके दरबार में भक्तों की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही थी। इसी क्रम में एक दिन पांच छः लोग कुछ शिकायतें और सुझाव लेकर बाबा के दरबार में हाज़िर हुए। वे बाबा के मार्फत अपनी शिकायतें और सुझाव ऊपर पहुंचाने की मुराद लेकर आये थे।
समूह के लोगों ने बाबा को बताया कि वे देश की एक बड़ी संख्या की भावनाएं लेकर आये हैं। उन्होंने कहा कि देश के बहुत से लोग इस बात को लेकर व्यथित हैं कि आदमी को जन्म के समय अनेक ऐसे अंग दे दिये जाते हैं जिनका उसके जीवन में कोई उपयोग नहीं होता। इस तरह बहुमूल्य कच्चा माल ‘वेस्ट’ होता है, उसका दुरुपयोग होता है। लोगों की भावना है कि अगर उपयोग में न आने वाले अंगों की पूर्ति सीमित कर दी जाए तो बड़ी बचत हो सकती है। अंग उन्हीं को दिये जाएं जिन्हें उनकी ज़रूरत है।
समूह की बात सुनकर बाबा विस्मित हुए। पूछा कि कौन से अंग आदमी के लिए फालतू हैं। समूह के लोगों ने बाबा को बताया कि बहुत से लोगों को अपने दिमाग का इस्तेमाल करने की ज़रूरत नहीं होती। पॉलिटिक्स में यही हो रहा है। जहां पार्टी कहे वहीं हाथ उठाना पड़ता है। ऐसा ही कई संगठनों में भी होता है। वहां भी अनुयायियों को अपना दिमाग अलमारी में रख देना होता है। धर्मगुरुओं के शिष्यों को भी अपने दिमाग के इस्तेमाल की मुमानियत होती है। ‘महाजनो येन गतः स पंथाः’ का सिद्धान्त चलता है। गुरू जो रास्ता दिखाये उसी पर चलो।
वही बात आंखों पर भी लागू होती है। पहले बताये गये सभी संगठनों में छुटभैये या अनुयायी को नेता या गुरू की आंखों से ही देखना पड़ता है। इसलिए अपनी आंखें फालतू हो जाती हैं।
समूह ने बाबा जी को बताया कि एक और अंग जो फालतू और असुविधाजनक साबित हुआ है आदमी की रीढ़ है। राजनीति समेत सभी संगठनों में रीढ़ बड़ी अड़चन पैदा करती है। समूह ने बताया कि बहुत से लोगों ने उन्हें जानकारी दी कि किसी बड़के आदमी के सामने झुकते वक्त उनकी रीढ़ उनके आड़े आ गयी और उन्हें शर्मिन्दगी उठानी पड़ी। लोगों का मत है कि वैसे भी रीढ़ शरीर में छिपी रहती है, इसलिए उसे आसानी से हटाया जा सकता है।
समूह ने बताया कि एक और अड़चन पैदा करने वाली चीज़ अंतरात्मा या ज़मीर है जो शरीर में पता नहीं कहां रहती है, लेकिन आदमी जब भी कोई दो नंबर का काम करना चाहता है आत्मा उसे कोंचने लगती है। कुछ लोग अंतरात्मा को सुलाने में सफल होते हैं, लेकिन कई लोग आत्मा के द्वारा बार-बार कोंचे जाने से परेशान रहते हैं। कई लोग आत्मा के कोंचने से परेशान होकर आत्महत्या की सोचने लगते हैं। इसलिए अंतरात्मा नाम की चीज़ से मुक्ति ज़रूरी है।
समूह ने बाबा जी को बताया कि बहुत से लोग इन अंगों से तो मुक्त होना चाहते हैं, लेकिन वे एक अंग की वापसी भी चाहते हैं। लोगों का कहना है कि वानर की औलाद होने के कारण कभी मनुष्य के भी दुम थी, लेकिन वह कालांतर में झड़ गयी। शायद पहले का आदमी ख़ुद्दार रहा होगा, इसलिए उसे दुम हिलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती होगी और इसीलिए वह धीरे-धीरे गायब हो गयी। लेकिन अब आदमी को एक अदद दुम की सख्त ज़रूरत है क्योंकि जो काम खुशामद के दस जुमलों से नहीं होता वह एक बार दुम हिलाने से हो जाता है। इसलिए ज़रूरतमंद लोगों के लिए तत्काल दुम की व्यवस्था करके उन्हें राहत दी जाए।
अन्त में एक और बात समूह ने बाबा को बतायी कि कुछ लोग चाहते हैं कि उनकी ज़बान बीच से काट दी जाए, जैसी सांप या मेंढक की होती है, जिसे अंग्रेजी में ‘फ़ोर्क्ड टंग’ कहते हैं। इससे उन्हें एक ही समय दो तरह की बात कहने में आसानी होगी। यह राजनीतिज्ञों के लिए बड़े काम की सिद्ध होगी।
बाबा ने समूह की बात सुनकर उन्हें आश्वस्त किया कि उनकी भावनाएं बाबा की सिफारिश के साथ वायु-वेग से ऊपर पहुंचा दी जाएंगीं। समूह बाबा के चरणों में पर्याप्त दक्षिणा अर्पित कर विदा हुआ।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






मजेदार!
इससे जिंदगी सिम्प्लिफाई हो जाएगी और डॉक्टर्स के कुछ स्पेशलाइजेशन कम होंगे।
क्रिएटिव सोच से आनंद आया।
प्रणाम एवं साधुवाद स्वीकार करें।
🙏🌷🙏
धन्यवाद, बिष्ट जी