श्री प्रतुल श्रीवास्तव
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “यहां सभी भिखारी हैं”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १६ ☆
☆ व्यंग्य ☆ “यहां सभी भिखारी हैं” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
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पशु – पक्षियों में भले ही मनुष्यों के गुण न पाए जाते हों पर मनुष्यों में पशु-पक्षियों के गुणों के दर्शन अवश्य ही होते हैं। यदि कुछ लोगों के क्रियाकलापों और चाल ढाल से हमें उनमें चतुर, फुर्तीले, साहसी वनराज “शेर” के दर्शन होते हैं तो राजनीति में अथवा हमारे आसपास ऐसे भी अनेक लोग हैं जिनमें हमें गधा, कुत्ता, बंदर, उल्लू, बाज अथवा चालाक लोमड़ी के गुण कूट कूट कर भरे हुए दिखाई देते हैं। आप सभी इस तरह की वर्तमान राष्ट्रीय विभूतियों से परिचित हैं इसलिए मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता।
पर्यावरणविद और पशु – पक्षी प्रेमी अनेक प्रजातियों के जीव – जंतुओं की संख्या में निरंतर आ रही गिरावट के कारण चिंतित हैं। विज्ञान के माध्यम से विलुप्त हो चुके जीवों को पुनर्जीवित करने और घट रहे जीवों को बचाने के तरह – तरह के उपाय खोजे जा रहे हैं। सनातन मान्यता है कि आत्मा सभी प्राणियों में एक ही है जो कभी नहीं मरती वरन कर्मों के आधार पर क्रमशः श्रेष्ठ योनि प्राप्त करती है। मुझे तो लगता है कि विलुप्त हो रहे प्राणी मनुष्यों के रूप में जन्म ले रहे हैं तभी तो मनुष्यों की संख्या में अपार वृद्धि हो रही है। आपको ऐसा नहीं लगता जैसे धरती से बिल्कुल समाप्त हो चुके डायनासोरों का पुनर्जन्म अमेरिका, रूस और चीन के राष्ट्रपतियों के रूप में हो रहा है ?
खैर, अभी हाल ही में मैंने जब एक समाचार पढ़ा कि मध्य प्रदेश में गधों की संख्या में भारी गिरावट आई है तो गधों के प्रति मेरा हृदय पीड़ा से भर गया। जब मध्य प्रदेश जैसा सौजन्यता व शांति से भरा क्षेत्र गधों को पसंद नहीं आ रहा और उनकी संख्या घट रही है तो देश के अन्य क्षेत्रों में भी इसमें अवश्य ही गिरावट दर्ज हुई होगी। समाचार में बताया गया है कि 27 वर्ष पहले मध्य प्रदेश में 49 हजार गधे थे जो आज घटकर मात्र 3052 रह गए हैं। प्रदेश के 9 जिले तो गधा विहीन घोषित हो चुके हैं। अब यहां किसी को ढेंचू – ढेंचू की आवाज सुनाई नहीं देती। नर्मदापुरम में सर्वाधिक 335 गधे हैं जबकि संस्कारधानी जबलपुर में मात्र 4 गधे बचे हैं। “न काहू से दोस्ती न काहू से बैर” भाव से शांति पूर्वक जीवन यापन करने वाले गधों के प्रति मेरे हृदय में गहरी संवेदना है। आखिर गधा कब तक और कितना अपमान सहे ? यदि किसी महिला या पुरुष को गाय की तरह सीधा कह दो तो वह इसे अपनी प्रशंसा अथवा सम्मान समझता है किंतु अगर उसे गधा कह दिया जाए तो उसका घोर अपमान समझा जाता है। शासन-प्रशासन ने तो गधा शब्द को असंसदीय शब्दों की सूची में डाल दिया है। शिक्षकों पर प्रतिबंध है कि वह किसी विद्यार्थी को गधा न बोले वरना उसे जेल भी जाना पड़ सकता है। मैं समझता हूं कि गधे में राग – द्वेष, मान-अपमान से परे पवित्र आत्मा का वास होता है। वह ईमानदार, कर्मठ, सहनशील और अहिंसक होता है। यदि गधा मोटी चमड़ी का असंवेदनशील प्राणी नहीं होता तो इतने घनघोर अपमान से अब तक तो इसकी पूरी नस्ल ही समाप्त हो गई होती। सरकार अनेक विलुप्त हो रहे हिंसक पशु – पक्षियों तक के संरक्षण के लिए चिंतित व प्रयासरत है। मेरा सरकार सहित पशु प्रेमियों से आग्रह है कि संसार के इस सीधे साधे प्राणी को बचाने के लिए भी युद्ध स्तर पर प्रयास शुरू करें क्योंकि यदि गधा नहीं होगा तो बुद्धिमानों की पहचान करना कठिन हो जाएगा। गधों पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि गधा बलिष्ठ होता है, यह 10 किलोमीटर दूर की गंध भी सूंघ सकता है, अपने चेहरे से भाव प्रकट करने की क्षमता भी इसके पास होती है। चीन में गधे की खाल से “एजियाओ” नामक दवा बनाई जाती है जिसके कारण हर साल लाखों गधों की हत्या की जाती है।
एक बात और है, कुछ चतुर लोग स्वेच्छा से “गधत्व” अपना लेते हैं उन्हें स्वयं को गधा घोषित करने अथवा कहलाने में कोई शर्म-संकोच नहीं होता। लोगों के बीच गधा घोषित हो जाने के फायदे भी हैं। काम के जानकार चतुर लोगों या कर्मचारियों के बीच ये आराम से रहते हैं, इन्हें कभी जिम्मेदारी से भरे महत्वपूर्ण कार्य नहीं सौंपे जाते। भोंदू बने रहने वाले, सार्वजनिक रूप से “गधा” घोषित इन लोगों की उपस्थिति को हानि रहित मानकर लोग खुलकर अधिकारियों की या अन्य महत्वपूर्ण लोगों की निंदा और गोपनीय बातें करते रहते हैं। गधे की खाल ओढ़े ऐसे व्यक्ति सुनी हुई इन बातों को इधर से उधर करके मौका मिलने पर चतुरों के कान काट लेते हैं। ऐसे बने बनाए गधों को ही “पंजीरी का भोग” प्राप्त होता है। वह जमाना गया जब गधे को शेर की खाल पहनना पड़ती थी, अब लोग गधे की खाल पहन कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। शायद आपको मालूम न हो कि गधों के कल्याण की भावना से 8 मई को विश्व गधा दिवस मनाया जाता है। भाइयो गधों की उपेक्षा नहीं करें, उनसे नफरत नहीं, प्रेम करे।
© श्री प्रतुल श्रीवास्तव
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