सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ आलेख ☆ रात की मुस्कान–पारिजात ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

ऐसा नहीं कि इन्द्र दरबार की अप्सरा ” उर्वशी” ही पारिजात के कोमल फूलों को छू सकती है। उसकी महक और दूधिया सिन्दूरी रंग को नैनों में बसा सकती है। समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों में से एक दिव्य पुष्प पारिजात की पंखुड़ी पंखुड़ी पर लिखी हुई पौराणिक कथाओं को बाँच सकती है।

यह द्वापर युग की कथा है कि पारिजात के रूप का जादू कृष्णप्रिया सत्यभामा ने भी अनुभव किया। हुआ यूँ कि देवर्षि नारद ने सत्यभामा को यह मोहक पुष्प भेंट किया। मोहाविष्ट सत्यभामा, कृष्ण से ज़िद कर बैठीं कि उनकी वाटिका में देवतरु चाहिए। इन्द्र के इंकार करने के बावजूद कृष्ण गरुड़ पर बैठकर गये और स्वर्ग से पारिजात धरती पर ले आये। कितनी रूनझुन करती कथा है कि पारिजात रोपा गया सत्यभामा की वाटिका में और फूल झरते रहे रुक्मिणी की बगिया में।

कहा तो ये भी जाता है अर्जुन, यह वृक्ष माता कुन्ती की खातिर स्वर्ग से लेकर आये थे।

हर सिंगार, शेफालिका या शिउली और मराठी में प्राजक्त ये सारे तितली के पंखों जैसे कोमल नाम पारिजात के ही हैं। यूँ ही नहीं इसे पश्चिम बंगाल के राज्य पुष्प का दर्जा दिया गया। इसमें देवत्व का वास है एवं यह सकारात्मकता का सौंदर्य बिखेरता है। कोई इसे  दुःख का वृक्ष कहता है तो कोई ” रात की मुस्कान। “रात के अंधेरे का रेशा रेशा महकाता,प्रकृति की कविता  कहलाता है। हवाएं महक के साथ मधुमय सरगम साथ लिए चलती हैं। सूर्यकिरणों के छूते ही धरती पर झर जाता है। पारिजात के मानी हैं किसी से अवतरित होना या दिव्य रूप से प्रकट होना।

यह हर या शिव का प्रियतम पुष्प है। कितनी सुकुमार अभिव्यंजना है कि इसे तोड़ा नहीं जाता, चुना जाता है।

इसे प्रकृति का उपहार ही कहेंगे कि यह औषधि गुणों से भरपूर है। सायटिका एवं उदर रोगों में रामबाण। रूप गंध रंग के साथ उपचार की बात, गजब है पारिजात।

इतना कोमल  कि डाल से अलग करते हुये हस्तस्पर्श से आहत हो जाता है। इन फूलों का सौंदर्य ही नहीं पीड़ा भी वही समझ सकता है जिसका अंतस पारिजात सा हो।

झरो हरसिंगार झरो

प्राणों से लिपटी है जो

जाने कितने जन्मों से

कुछ तो पीर हरो।।”

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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