सुश्री इन्दिरा किसलय
☆ लघुकथा ☆ निष्ठा का अचार ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
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एक युवा बेरोजगार से किसी ने पूछा –एक सवाल का जवाब दोगे !
–हां पूछिए
–मान लो आप राजनीति में हो और चुनाव जीत गये। बड़ी पार्टी ने तुम्हें 100 करोड़ ऑफर किये कि तुम्हें उनकी पार्टी में विलय करना होगा अपने विजयी साथियों के साथ तो तुम क्या करोगे !
–ये भी कोई पूछने की बात है ?
मतलब बड़ी शान से विलय कर लूंगा।
और तुम्हारी अपनी पार्टी के प्रति निष्ठा का क्या होगा ?
–निष्ठा का अचार डालना है ! निष्ठा को आजकल पूछता कौन है।
—ठीक है लेकिन इतने पैसों का करोगे क्या ?
दुनिया घूमूंगा। गरीबों की मदद करुंगा। आखिर पैसा ही तो सब कुछ है।
—गांधीजी कहते थे साध्य ही नहीं साधन भी पवित्र होना चाहिए।
— गांधीजी—! उन्हें तो मैं ही नहीं सारा देश जेब में लेकर घूमता है।
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© सुश्री इंदिरा किसलय
नागपुर
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





