श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मटर के दाने …“।)
अभी अभी # ८२७ ⇒ आलेख – मटर के दाने
श्री प्रदीप शर्मा
~~ PEAS ~~
पौष माह के शुरू होते ही सर्दियां शुरू हो जाती हैं, और ठंड बजने लगती है। जमकर भूख लगती है और बाज़ार में फल फ्रूट और सब्जी भाजी की बहार आ जाती है। स्वदेशी और ऑर्गेनिक क्या बला है, हम नहीं जानते, बस कहीं देसी टमाटर और हरे भरे मटर नज़र आ जाएं, तो हमारी नजर से बच नहीं पाएँ। मटर हमारी कमज़ोरी है और बटले की कचौरी इंदौर वालों की खासियत।
हम मटर को स्थानीय भाषा में बटला भी बोलते हैं लेकिन अंग्रेजी जैसा मामला यहां नहीं, जहां pea के आगे अगर nut लगा दो, तो मटर मूंगफली बन जाए। सभी दालें हम बीनकर खाते हैं, लेकिन हमने कभी ना तो beans ही खाई और ना ही इसके बारे में ज्यादा छानबीन की।।
मेरी ड्यूटी कभी जनगणना कार्य में नहीं लगी और मेरा गणित भी कोई खास नहीं है, लेकिन मुझे मटर के दानों को छीलने और उन्हें गिनने का विशेष शौक है।
यह दायित्व मुझे सौंपा नहीं जाता, लेकिन मैं स्वतः ही इसका संज्ञान लेता हूं और यह मेरी एक स्वांतः सुखाय गतिविधि है, जिसमें सिर्फ एक से दस तक की ही गिनती काफी है क्योंकि एक मटर के दस से अधिक दाने होते ही नहीं।
मैं एक साबुत मटर की फली उठाता हूं, मन ही मन एक पारखी की तरह उसे नाप तौलकर अंदाज़ लगाता हूं, इसमें कितने दाने होंगे। यह संख्या तीन से तेरह, कोई सी भी हो सकती है। अगर मेरा अंदाज सही निकल गया तो फुल मार्क्स, वर्ना अगले मटर की बारी। एक हरे मटर में औसत पांच से आठ दाने तो निकल ही आते हैं। उनकी सेहत देखकर उनके परिवार की संख्या का आसानी से अंदाज लगाया जा सकता है। यहां एक छोटा परिवार, दुखी परिवार माना जाता है। एक स्वस्थ खाते पीते मटर के परिवार में आठ से दस दाने बड़ी आसानी से निकल आते हैं। कुछ परिवार हम दो, हमारे दो वाले भी होते हैं, तो कुछ में सिर्फ हवा भरी होती है। उन्हें पोचा मटर कहा जाता है।।
ओस और पाला पड़ने पर मटर के परिवार पर भी गाज गिरने लगती है। मटर में इल्लियाँ प्रवेश कर जाती हैं। अच्छा भला मटर का परिवार तहस नहस हो जाता है। किसी मटर के छीलने पर जैसे ही कोई इल्ली दिखाई देती है, उस मटर को बेरहमी से, सपरिवार, गीले कचरे के हवाले कर दिया जाता है।
मटर छीलना सबसे आसान काम है, लेकिन यह दायित्व परिवार के बच्चों को कभी नहीं दिया जाता। होता यह है कि छीलते छीलते मटर के दाने तो बच्चों द्वारा उदरस्थ हो जाते हैं और छिलके धन्यवाद सहित वापस सौंप दिए जाते हैं।।
इसी कारण जहां जिम्मेदार लोगों द्वारा मटर छीले जाते हैं, उनके आसपास अक्सर बच्चे मटरगश्ती करते पाये जाते हैं। मटर के आसपास गश्त करते हुए, उनकी चौकन्नी निगाहें एक बाज की तरह, मटर के दानों पर पड़ती है, और एक मुट्ठी में दाने भरकर, यह जा, वह जा। जाने दो, बच्चे हैं, कहीं से आवाज आती है। फिर भी हिदायत का डोज तो मिल ही जाता है, कम खाओ, ज्यादा कच्चे मटर हजम नहीं होते। अरे कुछ नहीं होता, इस उम्र में पत्थर कंकर सब हजम हो जाता है, हमने भी बहुत खाए हैं अपने जमाने में, एक अनुभवी आवाज पुनः फरमाती है।
आलू, टमाटर और मटर अपने आप में सब्जी तो हैं ही, सभी सब्जियों के साथ इनका गठजोड़ भी बेजोड़ है। पोहे से लेकर मटर पनीर तक, मटर का ही साम्राज्य है। आलू टमाटर भी आपको सभी सब्जियों के आसपास मटकते देखे जा सकते हैं। लालू भले ही राजनीति से गायब हो गए हों, समोसे में मटर के साथ आज भी आलू ससम्मान विराजमान है।।
जिस आदमी को रोटी, कपड़ा और मकान आसानी से उपलब्ध है, उसे इस मौसम में आलू, टमाटर और मटर भी सस्ते दामों पर उपलब्ध हों। आपके घरों में कभी आलू मैथी की सब्जी बने तो कभी मैथी, मटर मलाई। महंगाई से थोड़ी राहत हो, इसमें सभी की भलाई। आपके हर मटर में भरपूर दाने हों, क्योंकि दाने दाने पर खाने वाले का नाम जो लिखा रहता है।
वनस्पति विज्ञान भले ही मटर और मूंगफली को एक ही तराजू में तौले, मटर को तरकारी नहीं, एक फल साबित करने की कोशिश करे, हमारा पुलाव बिना मटर के नहीं बनेगा और आलू और मूंगफली बिना साबुदाने की खिचड़ी नहीं।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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