डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘‘रूट्स’ की खोज-खबर‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३११ ☆
☆ व्यंग्य ☆ ‘रूट्स’ की खोज-खबर ☆
संतोष भाई आठ दस साल से ‘स्टेट्स’ में बस गये हैं। बच्चे भी अब आठ दस साल के हो गये हैं। बड़ी बेटी है और छोटा बेटा। संतोष भाई के गांव में अभी मां-बाप और अन्य रिश्तेदार हैं। तीन चार साल पहले वे अकेले गांव गये थे। अमेरिका के घर में मां-बाप, चाचाओं-चाचियों और गांव के घर की फोटो टंगी है। कई बार उन्हें हसरत से देख लेते हैं, लेकिन इंडिया वापस लौटने की नहीं सोचते।
लेकिन कुछ दिनों से संतोष भाई के मन में यह बात बार-बार आ रही है कि बच्चे बड़े हो गये, उन्हें अपनी ‘रूट्स’ से परिचित कराना चाहिए। उन्हें पता होना चाहिए कि उनके ‘एंसेस्टर्स’ कहां से आये थे, वे कैसे रहते थे, इंडिया का गांव कैसा होता है, वगैर:-वगैर:। बेटी सयानी हो रही है, कहीं कल के दिन डेटिंग वेटिंग के चक्कर में न पड़ जाए, इसलिए इंडियन कल्चर की जानकारी देना ज़रूरी है। जब से संतोष भाई के दिमाग में ये बातें आयी हैं तब से वे ‘टु द रूट्स’, ‘टु द रूट्स’ बुदबुदाते रहते हैं।
संतोष भाई करीब एक महीने का प्लान बनाकर पांच छः दिन के लिए अपने गांव आ गये। दोनों बच्चे और पत्नी, रेखा, साथ हैं। गांव से ससुराल जाएंगे, फिर घूमने के लिए शिमला मसूरी।
मां बाप पोते-पोती को देखकर खुश हुए। गांव से और रिश्तेदार-परिचित जुटने लगे। गांव की दीदियां, चाचियां, बुआएं आने लगीं। घर में भीड़ होने लगी। महिलाएं बच्चों को लिपटाने चिपटाने की कोशिश करतीं तो रेखा की नाक सिकुड़ती। ‘इनफेक्शन’ का डर लगता। यहां कोई ढंग का डॉक्टर भी नहीं मिलेगा।
गांव में बहुत तब्दीली हो गयी। संतोष भाई के बचपन में रोशनी के नाम पर लालटेनें और लैम्प थे, पानी कुएं से आता था, रसोई के लिए चूल्हा था, खेती के लिए हल और परिवहन के लिए बैलगाड़ी थी, लोग कम पढ़े-लिखे और सीधे-सादे थे और सब तरफ सादगी और मजबूरी का आलम था। कारों के दर्शन कभी-कभी रसूखदारों की कृपा से होते थे। अब सब घरों में बिजली और नल थे, रसोई के लिए गैस थी, खेती- परिवहन के लिए ट्रैक्टर आ गये थे, लोग शिक्षित और चतुर हो गये थे और जीवन में चमक आ गयी थी। पहले लड़कियां संकोच में सिकुड़ीं घर में रहती थीं, अब वे पूरे आत्मविश्वास से मोबाइल और लैपटॉप पर काम करती दिखायी पड़ती थीं। कई घरों के दुआरे पर कारें देखी जा सकती थीं। कभी गांव में सिर्फ वैद्य का एक घर था जिसकी सेवा बड़े लोगों को ही मयस्सर होती थी, बाकी जनता रामभरोसे थी। अब सरकारी डॉक्टर के अलावा प्राइवेट डॉक्टर भी थे। सरकारी स्कूलों के अलावा प्राइवेट स्कूल भी पहुंच गये थे। गांव में ज़रूरी सुविधाएं पैदा हो गयी थीं।
लेकिन संतोष भाई को बच्चों को उनकी ‘रूट्स’ से रूबरू कराना है। वे घर के टांड़ में पुरानी चीज़ों को खंगालने में लगे हैं। पुरानी चीज़ों का ढेर लग रहा है। मिट्टी मंगवा कर चूल्हा बन रहा है। जलाने के लिए सूखी टहनियां मंगा ली गयी हैं। टांड़ पर एक टूटी चिमनी वाली लालटेन मिल गयी है। संतोष भाई उसे पोंछ-पांछ कर जलाते हैं। बच्चे देखकर कौतूहल से ताली बजाते हैं। दादी चूल्हा जलाती है, बच्चे धुएं की मार से बचने के लिए दूर खड़े होते हैं। रेखा हाथ नहीं लगाती, जलने का डर है।
टांड़ में हाथ से झलने वाला पंखा भी मिल जाता है। संतोष भाई बताते हैं कि पुराने ज़माने का ‘फ़ैन’ यही है। इसी के सहारे गर्मी कटती थी। बच्चे ताज्जुब से उस अजूबे को देखते हैं। संतोष भाई घुमा घुमा कर उसका प्रदर्शन करते हैं। बताते हैं कि उसे ‘बिजना’ कहा जाता था।
सवेरे दही बिलोने के लिए मथानी चलती है। दादी बच्चों को दिखाने के लिए रस्सी से खींचकर मथानी चलाती हैं। मक्खन या ‘नैनूं’ निकाला जाता है। बच्चे भी एक दो बार खींचा- खांची करते हैं। मज़ा आता है। फिर मां बरजती है। रस्सी से हाथ कटने का डर है।
संतोष भाई बच्चों को घर के सामने मीठे पानी के कुएं पर ले जाते हैं। गांव में मीठे पानी के दो-तीन कुएं ही हैं। कुएं पर मोटी रस्सी और उसमें बंधी बाल्टी पड़ी है। संतोष भाई वीरता दिखाने के लिए बाल्टी को कुएं में लटका देते हैं। कुआं गहरा है। संतोष भाई भरी बाल्टी खींचते हैं। आधी दूर तक खींचते खींचते उनकी हालत खराब हो जाती है। हांफी चढ़ जाती है। मुश्किल से बाल्टी को जगत तक पहुंचाते हैं, फिर कमर पर हाथ रखकर लंबी सांसें लेने लगते हैं। रेखा नाराज़ होकर बुदबुदाती है—‘सिली।’
अगले सवेरे एक बैलगाड़ी दरवाज़े आ लगी। ‘द चिल्ड्रेन विल गो फॉर अ राइड। इट विल बी अ नेसेसरी एक्सपीरिएंस।’ बच्चे बैलों को देखकर ‘काउ काउ’ चिल्लाने लगे। उन्हें बताया गया कि वे ‘काउ’ नहीं, ‘ऑक्स’ थे। गाड़ी में मोटा कालीन बिछाया गया ताकि झटके कम से कम लगें। गाड़ी चली तो हर गढ्ढे पर उछलने पर बच्चे ‘ओह’ ‘आह’ करते। पहले तो उन्हें मज़ा आया, फिर उनका मुंह बिगड़ने लगा। रेखा परेशान होने लगी। ज़्यादा उछलने पर छोटी-मोटी चोट लगने का ख़तरा था। लाचार संतोष भाई ने आधे घंटे में ही गाड़ी वापस मुड़वा ली।
तीन दिन में संतोष भाई ने अपनी ‘रूट्स’ को काफी खंगाल लिया है। अब वे संतोष के साथ ‘स्टेट्स’ लौट सकते हैं। ‘वी हैव नॉट फॉरगॉटेन अवर रूट्स। अपनी रूट्स को भूलना नहीं है। वी आर प्राउड ऑफ़ देम। सैल्यूट टु अवर मदरलैंड। सैल्यूट टु इंडिया।’
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈



