श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  लल्लू की शादी में कल्लू का बैंड

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १८ ☆

☆ हास्य-व्यंग्य ☆ “लल्लू की शादी में कल्लू का बैंड” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

लल्लू की शादी थी। लल्लू के दोस्तों की जिद थी कि बारात में कल्लू का बैंड बजेगा, तभी झल्लू, लल्लू और सिल्लू नाचेंगे।

बारात में नृत्य होना अब कितना जरूरी “आइटम” हो गया है यह सभी जानते हैं। वह बारात भी कोई बारात है जिसमें घोड़ी चढ़े दूल्हे के आगे – आगे बैंड वादकों के बीच उसके दस – बीस साथी नाच – नाच कर आसमान सर पर न उठा लें। नर्तकों के दल के बिना आज बारात की कल्पना भी नहीं की जा सकती। नृत्यों के प्रदर्शन के बिना बारात वैसी ही बेमजा, अनाकर्षक लगती है जैसे नमक के बिना दाल, बूट के बिना सूट और ठुमकों के बिना खूबसूरत कमसिन हसीना की चाल।

यदि व्हेनसांग या फाहयान जैसा कोई चीनी यात्री इस समय भारत यात्रा का वर्णन लिख रहा होगा तो उसने यहां के विवाहों और बारातों पर अवश्य ही लिखा होगा कि भारत में विवाह अब पंडितों के मुहूर्त पर नहीं बैंड वादकों के दिए समयानुसार निर्धारित होकर संपन्न होते हैं। वर पक्ष नगर में उपलब्ध श्रेष्ठतम बैंड पार्टी को अपनी बारात हेतु तय करके पूरा पैसा कन्या पक्ष के सर मढ़ने की कोशिश करता है।

वर – पक्ष की हैसियत अब बारात के साथ चल रही बैंड पार्टी के स्टैण्डर्ड से आंकी जाने लगी है। बारात में बैंड वादकों के आगे आगे चमचमाते रथों अथवा सुसज्जित ठेलों पर ध्वनि विस्तारक यंत्र (लाउड स्पीकर) चलते हैं जो बैंड वादकों की संगीत कला और वर पक्ष की प्रतिष्ठा को दूर – दूर तक फैलाने का काम करते हैं। बैंड वादकों के दोनों ओर कतार से गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले बच्चे अथवा महिलाएं सर पर डिस्को लाइट व्यवस्था से जुड़े विद्युत बोर्ड रख कर चलते हैं जिनकी विद्युत छटा वाद्य यंत्रों से निकली तरंगों की भांति कंपित होकर नृत्य का वातावरण निर्मित करती है।

यों तो पथ पर जगह – जगह बारात रुकवाकर उपस्थित नर्तक दल अपने नृत्य का प्रदर्शन करता है, किंतु तिराहों – चौराहों पर नाच के विशेष और लम्बे प्रदर्शन हुआ करते हैं। आमतौर पर नशे के कारण बारात में उपस्थित युवा नर्तकों का समय बोध समाप्त हो जाता है। वे नाचना शुरू करते हैं तो उस समय तक नाचते ही रहते हैं जब तक कि बारात के साथ युवकों का संकोच पालते चुपचाप होश में चल रहे बड़े – बूढ़े बार – बार उनसे आगे बढ़ने का अनुरोध नहीं करते।

नर्तकों में कुछ तो घोषित नर्तक होते हैं जिन्हें केवल बारात के आगे – आगे नृत्य करने के उद्देश्य से ही दूल्हे अथवा उनके छोटे बड़े भाईयों द्वारा आमंत्रित किया जाता है। ऐसे युवा नर्तक नृत्य के प्रभाव को उभारने वाली भड़कीली, नए फैशन की पोशाकें धारण किए रहते हैं। सामान्यतः इनके बाल या तो बड़े – बड़े होते हैं अथवा सिर के चारों ओर के बाल साफ, केवल सिर के ऊपर बालों का गुच्छा होता है जैसे छिला हुआ नारियल। बैंड वादकों को इनके निर्देशानुसार नृत्य प्रधान फिल्मी गीतों की धुनें बजाना पड़ती हैं। युवकों की दृष्टि में इन कुशल तथा बड़े – बूढों की दृष्टि में इन भौंडी हरकतें करने वाले युवा नर्तकों का नृत्य अथवा उछलकूद जब पूरे जोश में होता है तब दर्शनीय वातावरण निर्मित होता है। ऐसा लगता जैसे अमिताभ बच्चन, जितेंद्र, ऋषि कपूर, सलमान खान और ऋतिक रौशन के भूत एक साथ इन पर सवार हो गए हों। अब तो बड़ी संख्या में महिलाएं भी बारातों में सड़क पर होने वाले नृत्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने लगी हैं। सच भी है जमाना बराबरी का है।

बारात के समक्ष नृत्य प्रदर्शन में बीच – बीच में निपुण नर्तकों द्वारा नृत्य से अंजान अथवा नृत्य करने में शर्माने, झिझकने वालों को भी नृत्य में सम्मिलित होने के लिए पकड़ – पकड़ कर खींचा जाता है। चूंकि बारात में नाचना दूल्हे से निकटता का परिचायक है, अतः नाच न जानने वाले अथवा नाच की इच्छा न रखने वालों को भी नृत्य आमंत्रण के बलात्कार का शिकार होना पड़ता है। जब इस तरह के लोग सामूहिक नृत्य करते हैं तो केवल तीन काम किए जा सकते हैं। पहला जी खोल कर हंसने का, किंतु हंसना अभद्रता का प्रतीक हो जाता है इसीलिए बारात में उपस्थित दर्शक हंसी आने पर भी हंस नहीं पाते, हां कुछ चेहरों पर मुस्कुराहट अवश्य आ जाती है। नृत्य से बिल्कुल ही अपरिचित किंतु नृत्य करने को मजबूर कुछ बेचारों का नृत्य देखकर जो दूसरा काम किया जा सकता है वह है सिर पटकने का। इसी तरह तीसरा काम, अपने बाल नोंचने का भी यदि दर्शक चाहें तो कर सकते हैं।

अस्तु, अंत में कन्या के घर तक पहुंचते – पहुंचते नर्तक दलों और बैंड वादकों में तू – तू, मैं – मैं होने लगती है। बैंड वादक भिन्न – भिन्न नर्तक दलों के पसंद की धुनें बजा – बजाकर परेशान हो जाते हैं। कोई कहता है ” खई के पान बनारस वाला” बजाओ, कोई “घोड़ी पे होके सवार, चला है दूल्हा यार” की फरमाइश करता है। तो कोई कहता है कि “तंबू में बम्बू” बजाओ। सबकी अलग फरमाइश होती है।

लड़की के घर के समक्ष नृत्य का विशाल, अनोखा और अंतिम प्रदर्शन किया जाता है जिसमें सारे कुशल, अकुशल नर्तक एक साथ भाग लेकर हंगामा खड़ा कर देते हैं। पंडित लड़की के माता – पिता से मुहूर्त निकला जा रहा है की गुहार लगाते हैं। आखिर समझने – बुझाने पर किसी तरह नृत्य निशा समाप्त होती है। मिलने को आतुर समधी गले मिलते हैं। नचईया कम हो रहे नशे की पूर्ति को निकल जाते हैं।

यह दृश्य केवल लल्लू की शादी और कल्लू की बैंड पार्टी का नहीं, आज की अधिकांश बारातों का है। हर शादी में झल्लू, मल्लू और सिल्लू जैसे नर्तक होते हैं। भले ही इनके नाम कुछ और हों। शादियों का समय चल रहा है, वैसे तो मुझे भरोसा है कि सभी के पास बारात के लिए नाचइयों का इंतजाम होगा फिर भी यदि किसी को नाचने वाले न मिल रहे हों तो उसे चाहिए कि वह पहले से दौड़ धूप कर ले, आजकल किराए पर सब उपलब्ध है।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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