डॉ. ऋचा शर्मा
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘माँ- सी‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १५७ ☆
☆ लघुकथा – माँ- सी ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
दो लड़के बड़ी देर से कमला बाई के घर के बाहर चक्कर लगा रहे थे। मीना बाई बहुत देर से उन्हें देख रही थी। कमला जब भी घर से बाहर जाती मीना दूर बैठी तन -मन से कमला के घर की चौकसी करती। कमला की लड़की अकेली है घर में। पंद्रह- सोलह साल की ही होगी पर अभी से बहुत सुंदर दिखती है, नजर हटती ही नहीं चेहरे से। वह मन ही मन सोच रही थी कि माँएं अपनी बेटियों की सुंदरता से कितनी खुश होती हैं लेकिन हमारे जैसी औरतें बेटी की सुंदरता से सहम जाती हैं।
बाईक पर आए उन दो लड़कों को ताँक –झाँक करते देख उसने पास जाकर पूछा —
“ऐ – ऐ कहाँ जा रहे हो?”
“तेरा घर है यह? अपने काम से मतलब रख।”
“वह तेजी से बोली – “हाँ मेरा ही घर है, अब बोल।”
“कमला बाई की लड़की से काम है।”
“क्या काम है? वही तो पूछ रही हूँ मैं।”
“उसी को बताना है। तू क्यों बीच में टांग अड़ा रही है?”
“वह कमला के घर का रास्ता रोक, कमर पर हाथ रखकर खड़ी हो गई। तू पहले मुझे काम बता फिर आगे बढ़ना।”
“जबर्दस्ती है क्या? क्यों बताएं तुझे? साली धंधेवाली होकर बहुत नाटक कर रही है। चल यार! फिर कभी आएंगे हम।”
भीड़ जमा होने लगी थी। बात बढ़ती देख दोनों लड़के तेजी से बाईक घुमाकर उसे गाली देते हुए वहाँ से चले गए।
“अरे! जब भी आएगा ना तू, मीना बाई ऐसे ही दरवाजे पर खड़ी मिलेगी। तू छू भी नहीं सकता मेरी बच्ची को।” मीना जोर – जोर से चिल्लाकर बाईक पर पत्थर मारती जा रही थी। आस- पड़ोसवालों की भीड़ लग गई थी। वे हतप्रभ थे। मीना बाई की लड़की को तो बहुत पहले गुंडे उठा ले गए थे।
© डॉ. ऋचा शर्मा
प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001
संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005
e-mail – richasharma1168@gmail.com मोबाईल – 09370288414.
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





