श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  मूंछें, पुलिस और रौब

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १९

☆ हास्य – व्यंग्य ☆ “मूंछें, पुलिस और रौब” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

यदि कोई पुलिस वाला किसी गुंडे, बदमाश अथवा शरीफ आदमी के साथ गाली – गलौच या मारपीट करके उसकी इज्जत रूपी नाक काट लेता है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि यह तो रोजमर्रा की बात है, किंतु यदि कोई व्यक्ति किसी हवलदार को चेलेंज करके उसकी मूंछें काट कर उसे मुछमुंडा बना दे तो यह न केवल मूंछों की हानि उठाने वाले उस पुलिसिया के लिए वरन पूरे विभाग के लिये शर्म से डूब मरने वाली घोर आश्चर्य की बात होगी।

एक बार ऐसी ही एक घटना किसी थाने के प्रधान आरक्षक के साथ घटी। बताया गया कि आरक्षक को वहीं के एक व्यक्ति ने चेलेंज किया कि वह आरक्षक की मूंछें काट लेगा और आखिर रात के दो बजे उस व्यक्ति ने हवलदार साहब को “क्लीनशेव” कर दिया। यह पता नहीं चला कि इतना सब होने के बाद भी पुलिस ने उस दुस्साहसी का क्या किया ?

पुलिस विभाग का गहराई से निरीक्षण करने पर ऐसा समझ में आता है कि इस विभाग के लोगों को मूंछों से बड़ा लगाव है। 95 प्रतिशत पुलिसिया मूंछधारी होते हैं। जितने आकार प्रकार की मूंछें दुनिया में हो सकती हैं सभी इस विभाग के लोगों में पाई जाती हैं। तलवार से भाला कट तक और मक्खी से तितली के आकार तक की मूंछों को आप विभिन्न पुलिसियों के चेहरों पर शान से जमे देख सकते हैं।

लोगों का ऐसा सोचना है कि मूंछों से चेहरे पर कठोरता आती है, रौब मैं वृद्धि होती है, चेहरा मर्दाना मालूम होने लगता है। पुलिस को इन सभी की आवश्यकता होती है जो वे मूंछ उगाकर ग्रहण करते हैं। बड़ी – बड़ी मूंछें रख कर बहुत से कमजोर, डरपोक और पिद्दी टाइप के पुलिसिया भी लोगों पर रौब जमाने में सफलता प्राप्त कर लेते हैं। उनकी मूंछें देखकर ही लोग समझ जाते हैं कि यह पुलिस वाला है इससे दूर ही रहो। अब आप ही अंदाज लगाएं कि पुलिस की नौकरी और मूंछों का कैसा सम्बंध है। मूंछें पुलिस वालों की पहचान बन गई हैं, जिस पुलिस वाले की जितनी बड़ी मूंछें वह उतना ही दबंग, जांबाज माना जाता है। चावल में कंकड़ों की भांति पुलिस विभाग में भी कुछ मुछमुंडे पाए जाते हैं, किंतु उनके चेहरों में वो बात नहीं होती जो मूंछ वालों के चेहरों पर होती है।

पुलिस विभाग में मूंछों की लोकप्रियता और महत्व देखते हुए मेरे हिसाब से तो इसे पुलिस वालों के लिए आवश्यक करार दे दिया जाना चाहिए। बल्कि मैं तो यहां तक कहूंगा कि जिस तरह इस विभाग में प्रवेश के लिए लम्बाई, सीना और वजन की न्यूनतम माप निर्धारित है उसी तरह मूंछों की भी न्यूनतम लम्बाई – चौड़ाई निर्धारित कर दी जाना चाहिए। मुझे विश्वास है कि इस कदम से अवश्य ही अपराधों की संख्या में कमी आएगी। जब मूंछें पुलिस का खौफ बढ़ाएंगी तो अपराधियों के हौसलों का पस्त होना स्वाभाविक ही है। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले तो पुलिस विभाग में मूंछ मेंटेनेंस भत्ता भी मिला करता था।

हां, एक परेशानी उस समय अवश्य पैदा हो सकती है जब मूंछ धारी पुलिस वालों के रौब से बचने अथवा उन पर अपना रौब कायम करने के लिए गुंडा तत्व भी उसी टक्कर की अथवा उनसे बड़ी मूंछें रखने लगें, फिर मूंछों में “कॉम्पटीशन” पैदा हो जाएगा। अस्तु, इस स्थिति में ऐसा कोई नियम भी बनाया जाना आवश्यक हो जाएगा जिससे आम आदमी की मूंछें पुलिस वालों की मूंछों से टक्कर न ले सकें। कहने का अर्थ यह कि आम जनता की मूंछों का आकर प्रकार भी निर्धारित करना होगा।

खैर यह तो एक ऐसी बात है कि जिस पर तरह – तरह से विचार किया जा सकता है। अब बात उठ गई है तो लोग इस पर सोचेंगे भी, सुधार भी करेंगे। समस्या उन बेचारे पुलिस वालों की होगी जिनकी मूंछें ऊगती ही न हों अथवा बिरली हों। ऐसी दशा में एक मात्र सहारा नकली मूंछें लगाने का ही बचेगा, किन्तु नकली मूंछें लगाना भी आज की स्थिति में कहां तक उचित होगा विचारणीय है। जब एक पुलिस वाला एक साधारण से आदमी से अपनी असली मूंछें कटवा चुका हो तब नकली मूंछों से बनी इज्जत का कहां तक भरोसा किया जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि अब पुलिस विभाग में पर्याप्त संख्या में महिलाएं भी आ गई हैं और आती जा रही हैं। महिलाओं के मूंछें नहीं होतीं और न ही उगाई जा सकती हैं अतः महिला पुलिस कर्मियों को लेकर मूंछों के प्रसंग पर बात करना व्यर्थ है। हां, बात खतम करते – करते इतना अवश्य कह दूं कि बिन मूंछों की महिलाओं के सामने बड़ी – बड़ी मूंछों वाले भी झुकते देखे गए हैं। चाहे वे गुंडे – बदमाश हों या मंत्री – संतरी। अतः विश्वास पूर्वक कहा जा सकता है कि महिलाएं पुलिस विभाग में मूंछें न होने के बाद भी उतनी ही सफल होंगी जितना सफल कोई मर्द बड़ी – बड़ी मूंछों के सहारे भी नहीं हो सकता।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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