श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सर्वहारा…“।)
अभी अभी # ८३७ ⇒ आलेख – सर्वहारा
श्री प्रदीप शर्मा
ईश्वर सर्व- शक्तिमान है,उसी से यह धरती-आसमान है और जो सर्वत्र विराजमान है ! सर्वहारा भी उसी की एक सन्तान है,और उसकी बनाई इसी धरती पर विद्यमान है। सर्वहारा शब्द उन लोगों पर लागू नहीं होता, जो ज़िन्दगी की दौड़ में आगे निकल जाना चाहते हैं। इन्हें आगे लाने वाले,इनसे कई कदम आगे निकल जाते हैं। वह तो बेचारा समझ ही नहीं पाता, कौन जीता कौन हारा।
सर्वहारा कोई आम शब्द नहीं ! यह खास लोगों के लिए, कुछ ख़ास लोगों द्वारा रचा गया है। सरल शब्दों में खेतिहर मजदूर और किसान ही इस श्रेणी में आते हैं। जिस तरह देश के कर्णधार देश के विकास के लिए बार बार विदेश जाते रहते हैं, उसी तरह सर्वहारा के संरक्षक उनकी समस्याओं के निराकरण के लिए कभी मास्को तो कभी चीन की यात्रा किया करते हैं। ।
सर्वहारा के दो दुश्मन हैं,एक तो समाजवाद और दूसरा बुर्जुआ ! जो खा-पीकर बुजुर्ग हुआ,उसे आप बुर्जुआ भी कह कहते हैं। पेंशनर कहीं से कहीं तक सर्वहारा में नहीं आता। भले ही वह इधर से उधर फिरता रहे मारा-मारा,परेशानियों का मारा।
आचार्य से भगवान ,और भगवान से एक कदम अधिक ओशो, कहते कहते थक गए कि,समाजवाद से सावधान। चिल्लाते-चिल्लाते वे अमेरिका चले गए,फिर भी उनकी किसी ने न सुनी और सर्वहारा की चिंता ने लालू को बे-चारा कर दिया और समाजवादी मुलायम के बेटों को सरकारी बंगले की टाइल्स तक उखाड़नी पड़ी। अगर गधे-घोड़े एक हो गए,अमीर गरीब एक हो गए, तो नेताओं के वादों का क्या होगा, सर्वहारा की क्रांति का क्या होगा। ।
सृष्टि के सुचारू रूप से चलने के लिए जितना जरूरी लक्ष्मी-नारायण का वरदान है,उतना ही सर्वहारा का सह-अस्तित्व भी ! दरिद्रों में नारायण का वास है ,इसलिए उनका भी रहना जरूरी है। लक्ष्मी भले ही तिजोरी में बंद हो,नारायण का वास हर छोटे-बड़े, अमीर-गरीब में समान रूप से है।
प्रेमचंद,रेणु की परती परी कथा और निराला की वह तोड़ती पत्थर को अगर आज आप सर्वहारा नहीं तो गरीब,वंचित,उपेक्षित ,पिछड़े अथवा मज़दूर ,किसान ,जो भी नाम दें, हमारे इस सभ्य,सुसंस्कृत,डिजिटल इंडिया का ही अंग है। जिन तक सूर्य की रोशनी बिना भेद-भाव तक पहुँचती रहती है,जिनकी झोपड़ियों में स्वच्छ हवा निर्बाध गति से बहती रहती है, भूख,प्यास और नींद जिन पर सदा मेहरबान रहती है,उन पर हमारे आकाओं की भी दृष्टि हो। उन्हें भी इंसान समझा जाए, उन्हें किसी राजनैतिक विचारधारा का मोहरा न बनाया जाए,विकास रूपी अमृत की कुछ बूँदें उनके हलक तक पहुंच जाए,तो आप चाहें तो इसे जुमला कहें,लेकिन स्वर्ग धरती पर उतर आए। ।
शहर से गाँव चलने के दिन अब लद गए ! अब तो सभी गाँव रोजगार के लिए शहर चले आ रहे हैं। वनवासी-आदिवासी तक जो पहुँचता है,या तो वह कोई प्रोजेक्टधारी एनजीओ होता है या फिर किसी राजनैतिक पार्टी का प्रचारक ! एक शहरी तो यहाँ अर्बन नक्सल से ही डरा हुआ है,वह क्या बस्तर के आदिवासियों के बीच जा पाएगा। जहाँ कभी प्रकृति की छाँव थी,आज वहाँ हिंसा और आतंक का साया है।
सर्वहारा हमारी पहुँच से बहुत बाहर है। जिसकी जगह हमारे दिल में होनी थी,उसकी जगह लाचारी,ग़रीबी, मज़बूरी में है। हमें आगे बढ़ना है,विजयी होना है। फ़िल्म अपना देश का यह गाना गाना है,सुन चंपा,सुन तारा ! कोई जीता कोई हारा। जो हारा, वही सर्वहारा। ।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




