डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘माले मुफ्त, दिले बेरहम‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१७ ☆
☆ व्यंग्य ☆ माले मुफ्त, दिले बेरहम ☆
टीवी में समाचार देखा कि 25 दिसंबर को लखनऊ में प्रेरणा-स्थल में जो तीन मूर्तियों के अनावरण का कार्यक्रम हुआ उसके बाद पुष्प-प्रेमी लोग वहां सजावट के लिए रखे गये तीन चार हजार गमले उठा ले गये। इनमें कोई वर्ग-भेद नहीं था। कार वाले, संपन्न, भी थे और स्कूटर वाले भी। पुरुष भी थे और स्त्रियां भी। पता चला कि हम नारी- सशक्तीकरण के मामले में कितना आगे बढ़ गये हैं। भरोसा हो गया कि भारतीय नारी अब हर क्षेत्र में पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। यह भी पता चला कि लोगों ने प्रेरणा-स्थल से क्या प्रेरणा ली।
हमारे देश में पुष्प-प्रेम जगजाहिर है। अनेक पुष्प-प्रेमी मुंह-अंधेरे ‘लग्गी’ लेकर निकलते हैं और फूल उगाने वाले हर मूर्ख गृहस्वामी की चारदीवारी के ऊपर से फूल खींचकर पॉलिथीन में डालते चलते हैं। कोई गृहस्वामी पीछे से गाली दे तो उसे भी शांत भाव से झेल लेते हैं। ‘तेरे फूलों से भी प्यार, तेरे कांटों से भी प्यार’ वाले उसूल पर चलते हैं। कई बार लग्गी से फूल खींचने के चक्कर में डाल ही टूट जाती है। पुष्प-प्रेमियों से यह सुना कि चोरी के फूल चढ़ाने से देवता अधिक प्रसन्न होते हैं। वैसे कई पुष्प-संग्राहकों को देखकर समझना मुश्किल होता है कि वे किस लिए फूल तोड़ते हैं क्योंकि उन्हें देखकर लगता नहीं कि वे रोज़ नहाते होंगे।
हाल ही में बागेश्वर वाले बाबा की यात्रा में भी बड़ी गड़बड़ी हो गयी। बाबा ने रास्ते में सोने के लिए 10-15 हजार रुपये के गद्दे-कंबल भक्तों को दिये, लेकिन भक्त इन्हें लेकर अपने घर चले गये। बाबा सोशल मीडिया पर भक्तों से अपील करते दिखे कि उन्होंने उधार लेकर गद्दों-कंबलों का इंतज़ाम किया था, अतः कृपा करके उन्हें लौटा दें। यानी लोग धर्म के आयोजन में भी पलीता लगाने से बाज़ नहीं आते। अब ये भक्त अपने घर में बाबा के गद्दा-कंबल में गर्म हो रहे होंगे और बाबा की जय जयकार कर रहे होंगे।
कभी रास्ते में माल ले कर जाने वाला कोई वाहन पलट जाए तो लोग मदद करने के बजाय माल को लूटना शुरू कर देते हैं। अगर गाड़ी में दारू की बोतलें हुईं तो लूटने वालों की मौज हो जाती है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री और श्रीलंका के राष्ट्रपति के देश छोड़कर भागने के समय भी उनके आवास में जमकर लूट-मार हुई थी। लोगों ने हसीना बेगम की साड़ियों और अंतर्वस्त्रों को भी नहीं छोड़ा था।
साहित्य में भी चोरी की बीमारी जब- तब पकड़ में आती रहती है। कई साल पहले एक ऐसे ही लेखक प्रकाश में आये थे जो दूसरों की रचनाओं पर अपना नाम चेंप कर पत्रिकाओं को भेज देते थे। जब वे पकड़े गये तो उन्होंने मासूमियत भरा बहाना बनाया कि उनकी पत्नी गलती से उनका नाम लिखकर रचनाएं भेज देती थी। वीर पुरुष गलती पकड़े जाने पर ऐसे ही बेचारी पत्नियों को ढाल बनाते रहे हैं। नतीजतन पतिदेव की लेखक बनने की आकांक्षा की भ्रूणहत्या हो गयी।
दरअसल चोरी की आदत एक बीमारी जैसी होती है जिसका विपन्नता से कोई लेना-देना नहीं है। इसे ‘क्लैप्टोमैनिया’ कहा जाता है। विदेश में बड़ी-बड़ी संपन्न अभिनेत्रियां दुकानों से सामान चोरी करते पकड़ी गयीं। हमारे देश में भी इस रोग के सबूत मिलते रहते हैं। मुफ्त की चीज़ आदमी को हमेशा लुभाती है, भले ही उसकी कीमत कुछ न हो।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





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धन्यवाद, बिष्ट जी।