श्री अरुण कुमार दुबे
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “समझ जाता छुपा है कोई मतलब…“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १३६ ☆
समझ जाता छुपा है कोई मतलब… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆
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ख़ामुशी भी इक सितम है हम सनम कब तक कहें
हाले दिल तुम भी सुनाओ हम ही हम कब तक कहें
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खास लोगों में इनायत के है चर्चे आपके
हम गरीबों पर भी कर दीजे करम कब तक कहें
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क़द्र जब तालीम फ़न की बंद है इस दौर में
ना-अहल को मारकर दिल मुहतरम कब तक कहें
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होती बंदर बाँट शासन की गरीबों को मदद
घूसखोरों के सितम को हम करम कब तक कहें
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तुम ब -ज़िद हो तर्के तअल्लुक़ के लिए फिर सोच लो
साथ जीने की कभी खाई कसम कब तक कहें
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देखकर मुँह इस तरह अपना न फेरा कीजिये
हो मेरे मुझको ये रहने दो भरम कब तक कहें
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राह चलते हम हैं सीधी क्या हमारा वास्ता
इस सियासत में बड़े है पैचो ख़म कब तक कहें
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रोज़ आबादी बड़ी ऐसी अगर जो मुल्क में
पैर फैलाने जमीं हो जाये कम कब तक कहें
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आपकी नजरों में दौलत की है इज्ज़त सिर्फ़ जब
आपके घर हम न रख्खेंगे कदम कब तक कहें
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शान में तेरी कशीदे कब पढ़े जो फिर पढ़े
ये बिकाऊ है नहीं अपना क़लम कब तक कहें
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इस जहाँ में किसको फ़ुरसत है फ़राहम गैर को
क्यों अरुण अपने सुनाने फिरता ग़म कब तक कहें
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© श्री अरुण कुमार दुबे
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عمدہ
حر شعر مکمل طور پر اپنی بات کہنے میں کامیاب