श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “मकर संक्रांति – साधना पर्व…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २७३ ☆ मकर संक्रांति – साधना पर्व… ☆
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सजा है आसमाँ पतंगों से
नेह के गीत गुनगुनायेंगे ।
पेंच पड़ते हुए गजब देखो
डोर मिल प्रीत की बढ़ायेंगे ।।
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दृश्य क्या खूब हुआ मौसम का
इंद्रधनुषों की ही बहारे हैं ।
जीत होवे सदा से उनकी जो
कर्म करके जहाँ सजायेंगे ।।
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पर्व पावन है संक्रति का
दान तिल गुड़ का करते जायेंगे।
डुबकी अमृत भरी चलो लेकर
नर्मदे हर ही नित्य गायेंगे ।।
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भोग खिचड़ी का सब लगाया जो
सूर्य आराधना समर्पित है ।
उत्तरायण हुआ है मंगल जो
गीत भजनों को हम सुनायेंगे।।
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जब आकाश में रंग-बिरंगी पतंगें उड़ती हैं, तब लगता है मानो जीवन स्वयं हमें पुकार रहा हो—
“उड़ो, पर अपनी जड़ों को मत भूलो।”
मकर संक्रांति हमें सिखाती है कि ऊँचाई पाने के लिए कटुता नहीं, कटौती चाहिए—अहंकार की, आलस्य की, नकारात्मक सोच की।
जैसे किसान नई फसल की तैयारी करता है, वैसे ही हमें भी अपने जीवन में नए संकल्पों के बीज बोने चाहिए।
जो स्वयं को साध ले, वही सच में ऊँचा उड़ता है।
सूर्य का तेज आपके जीवन को प्रकाशित करे,
अन्न की समृद्धि आपके घर में बनी रहे,
और आपके जीवन की पतंग सदैव ऊँचाइयों को छुए।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020
मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com
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