डॉ.राजेश ठाकुर
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “भारत की आत्म-व्यथा…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २०
कविता – भारत की आत्म-व्यथा… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
=1=
बंजर ज़मीं की रेत-सा, वीरान हो गया हूँ मैं
हालात देख अपने, परेशान हो गया हूँ मैं
=2=
इक ज़िस्म एक जाँ, ज़ुदा हम यूँ हुए कि ज्यों
आधा भारत, आधा पाकिस्तान हो गया हूँ मैं
=3=
गांधी सुभाष नेहरू भगत तिलक नहीं रहे
लगता है जैसे खण्डहर, मक़ान हो गया हूँ मैं
=4=
दंगे-फ़साद हो रहे, मज़हब के नाम पर
गीता बँटी और बँटकर, क़ुरआन हो गया हूँ मैं
=5=
सूखा अकाल बाढ़ कर्ज़ क़ुदरती क़हर
इन सबसे जूझता हुआ, किसान हो गया हूँ मैं
=6=
ईमान की ज़मीं था मैं ‘राजेश’ कभी, अब
घोटाले-भ्रष्टाचार की, खदान हो गया हूँ मैं
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© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
शासकीय कॉलेज़ केवलारी
संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071
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