डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘स्नान पर गंभीर चिन्तन‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२० ☆

☆ व्यंग्य ☆ स्नान पर गंभीर चिन्तन

दो दिन पहले छपी एक खबर पढ़ कर दिल बाग़-बाग़ है। जो बात मैं बिना किसी मेडिकल डिग्री के दशकों से सिर्फ अपनी आत्मा की आवाज़ के हवाले से कह रहा था वही अब बड़े-बड़े मेडिकल डिग्री वाले दुहरा रहे हैं। ‘बड़ी देर की मेहरबां आते आते।’  फिर सोचता हूं ‘देर आयद, दुरुस्त आयद’ और ‘जब जागे तभी सवेरा’।

मसला यह है कि अमेरिका के दो त्वचा- विशेषज्ञों ने राय दी है कि आदमी के लिए नहाना कतई ज़रूरी नहीं है। उनके अनुसार नहाना उन्हीं के लिए ज़रूरी है जो शारीरिक श्रम करके पसीना बहाते हैं या धूल-मिट्टी में सनते हैं। बाकी लोगों के लिए अकारण नहाना पानी की बरबादी है। इन विशेषज्ञों का कहना है कि नहाने से रोग-प्रतिरोधक क्षमता घटती है, त्वचा के रोग पैदा होते हैं और रोम- छिद्र बन्द हो जाते हैं। एक अमेरिकी विश्वविद्यालय के अध्ययन में सामने आया कि अत्यधिक स्नान से शरीर के सुरक्षा-कवच को हानि होती है और पाचन-तंत्र निर्बल होता है। इस अध्ययन के अनुसार ठंड में नहाना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है।

एक भारतीय वरिष्ठ चिकित्सक के अनुसार भी स्नान जो है वह शरीर की ‘इम्युनिटी’ पर प्रतिकूल असर डालता है, रोगों से लड़ने की क्षमता को प्रभावित करता है और त्वचा संबंधी समस्याएं पैदा करता है। इन चिकित्सक महोदय का सुझाव है कि आदमी को हफ्ते में पांच दिन ही नहाना चाहिए। वैसे मेरा सोच है कि इस सुझाव को उल्टा करके दो दिन नहाने और पांच दिन न नहाने के मुकर्रर किये जाएं तो बेहतर होगा।

मुझे पता है कि इन डाक्टरों की राय पर मैं कितनी भी बगलें बजाऊं, मेरे देश के लोग नहाने के खिलाफ कही गयी इन बातों पर कान देने वाले नहीं हैं। वजह यह है कि हमारे देश में नहाने को धर्म से जोड़ दिया गया है। यहां स्नान के बड़े-बड़े उत्सव होते हैं। बिना नहाये देवता की पूजा करने या मन्दिर जाने की मुमानियत है। दो कदम और आगे बढ़कर मान लिया गया है कि पवित्र नदियों में नहाने से आदमी के जनम-जनम के पाप कट जाते हैं। अब ऐसी स्थिति में अमेरिका के डाक्टरों की फालतू  नसीहत कौन मानेगा? मुझे भरोसा है कि अब तक देश के सभी घोषित- अघोषित पापी, उजागर या छिप कर, गंगा-स्नान करके पाप-मुक्त हो चुके होंगे। ये पापी यहां भले ही अपराधी माने जाएं, ‘वहां’ दूध के धुले बनकर, मूंछों पर ताव देते हुए जाएंगे और पहुंचते ही स्वर्ग में अपना दावा ठोकेंगे।

दुनिया की स्त्रियों को यह भ्रम है कि नहाने से उनका रूप-सौंदर्य महफूज़ रहता है। भ्रम-निवारण के लिए बताना ज़रूरी है कि मैंने एक लेख में पढ़ा था कि मध्यकाल में फ्रांस की स्त्रियां जीवन भर अपनी काया को पानी का स्पर्श नहीं होने देती थीं। पुरुष भी जीवन में एकाध बार ही नहाते थे। इसके बावजूद पूरी दुनिया में फ्रांसीसी महिलाओं के रूप और नफ़ासत का डंका बजता था। साबित होता है कि सौंदर्य की रक्षा के लिए स्नान बिलकुल ज़रूरी नहीं है।

एक अखबार में यह भी पढ़ा था कि इंडियाना में सर्दियों में नहाना कानून के खिलाफ़ है और बोस्टन में डाक्टर की सलाह के बिना नहाना गैरकानूनी है। हमारे देश में भी कुछ ऐसा ही कानून बन जाए तो स्नान-विमुख लोगों का मनोबल गिरने की स्थिति न बने। लेकिन उसी अखबार में यह भी पढ़ा कि इज़राइल में मुर्गियों के लिए शुक्रवार और शनिवार को अंडे देना गैरकानूनी है।

मैं तो फिलहाल तीन फुट आठ इंच के छोटू बाबा को अपना गुरू मान चुका हूं जो पिछले महाकुंभ में पधारे थे और जिन्होंने बत्तीस साल से स्नान नहीं किया था। उनका कहना था कि उन्होंने कोई व्रत लिया था और उसके पूरे होने पर उज्जैन में अपने गुरू के साथ स्नान करेंगे। उन्होंने अपने गुरू का नाम नहीं बताया, न ही बताया कि गुरूजी ने कितने दिन से स्नान नहीं किया। निश्चय ही गुरूजी चेले से दो चार हाथ आगे ही होंगे। छोटू बाबा ने यह भी नहीं बताया कि जब उन्हें महाकुंभ में नहाना नहीं था तो वे वहां किस लिए पधारे थे। जो भी हो, भक्त छोटू बाबा के चरण छूने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए उमड़ते रहे। बाबा जी ने सिद्ध किया कि नहाये बिना भी आध्यात्मिक ऊंचाई हासिल की जा सकती है।

जो भी हो, मेरी इस तकरीर या तकरार से यह न समझा जाए कि मैं नहाने के खिलाफ हूं। मुझे पता है कि यह स्नान-भक्तों का देश है और पानी में रहकर मगर से बैर लेना भला कौन चाहेगा?

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments