श्री संतोष नेमा “संतोष”
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक – भावप्रवण कविता – जीवन की सच्चाई समझो… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९० ☆
☆ जीवन की सच्चाई समझो… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
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जीवन की सच्चाई समझो |
कहाँ कुँआ है खाई समझो ||
कोई अपना कौन पराया |
किसने किसका साथ निभाया ||
हर मुश्किल में खुलतीं आँखें |
मुखड़ा साफ नजर में आया ||
परिचय की गहराई समझो |
जीवन की सच्चाई समझो ||
जो लगते थे सबसे प्यारे |
रहे सदा आँखों के तारे ||
बुरे वक्त में बदली रंगत |
लगते हैं अब मन के कारे ||
इनकी ये चतुराई समझो |
जीवन की सच्चाई समझो ||
मुँह में राम बगल में छूरी |
जिनके जीवन की यह धूरी ||
बहुरुपिया है आज आदमी |
जिनकी फितरत बस दस्तूरी ||
उनकी यह कुटिलाई समझो |
जीवन की सच्चाई समझो ||
है गतिशील समय यह भाई |
आगे की गति समझ न आई ||
सच्चा सहज सरल हो जीवन |
संतों ने यह बात सुझाई ||
कर्मों की अच्छाई समझो |
जीवन की सच्चाई समझो ||
*
कभी किसी का हक मत छीनो |
समझो मत निर्धन को हीनो ||
सबका जीवन पतझड़ जैसा |
याद रखो यह सबक कुलीनो ||
कैसे करें भलाई समझो |
जीवन की सच्चाई समझो ||
*
बनो न कच्चे कभी कान के |
लेना निर्णय स्वयं जान के ||
तब ‘संतोष’ मिलेगा तुमको |
निकलोगे जब स्वयं ठान के ||
निंदा सदा बुराई समझो |
जीवन की सच्चाई समझो ||
कहाँ कुँआ है खाई समझो ||
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© संतोष कुमार नेमा “संतोष”
वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार
आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





