आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह प्रस्तुत हैं आपकी रचना “याद के जुगनू, मेरे हमदर्द हैं।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३५ – याद के जुगनू, मेरे हमदर्द हैं ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

हैं यहाँ क़ातिल बहुत इंसान के

घोंटिये मत, खुद गले अरमान के
*
तिश्नगी को क्यों हवाले कर दिया

क्रूर संरक्षण में रेगिस्तान के
*
याद के जुगनू मेरे हमदर्द हैं

इनमें अंगारे नहीं अभिमान के
*
बेवफा अब बंद कर हमदर्दियाँ

बोझ ढो न पाऊंगा अहसान के
*
खैरख्वाहों की अधूरी लिस्ट है

और हैं दुश्मन अभी इस जान के
*
बन्द दिल की खिड़कियाँ करना नहीं

हैं नहीं अभ्यस्त हम सुनसान के
*
चिलमनों से यूँ न दिखलाओ शबाब

हुस्न मैं पीता नहीं हूँ छान के

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

३ दिसंबर २०१२

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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