श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “प्रेम…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५२ ☆

☆ # “प्रेम…” # ☆

जो झंकृत कर दे सांसों को

वही मधुर संगीत है

जो उन्माद भर दे रोम रोम में

वही  प्रेम गीत है

 

जिन नैनों में आस बसी हो

जिन होठों में प्यास सजी हो

व्याकुल तन हो, व्याकुल मन हो

जिस काया में रास रची हो

जिसमें पल-पल अगन लगाती

जन्म जन्म की प्रीत है

 

रूप से काया का रिश्ता

मोह से माया का रिश्ता

धूप से छाया का रिश्ता

तन से साया का रिश्ता

प्रेम में निभाना

युगों युगों की रित है

 

लैला मजनू शीरी फरियाद

प्रेमी करते उनको याद

हीर रांझा रोमियो जूलियट

कई प्रेमी हुए इसके बाद

प्रेमियों के विरहा में डुबे

कई लोकगीत है

 

प्रेम है सपनों को जीना

अपने प्रेमी को अपनाना

तोड़कर रूढ़ियों के बंधन

जग में चले तानकर सीना

प्रेम तो बस प्रेम है

ना कोई हार न जीत है

 

जो झंकृत कर दे सांसो को

वही मधुर संगीत है

जो उम्मत भर दे रोम रोम में

वही प्रेम गीत है/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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