डॉ.राजेश ठाकुर
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “ऋतु वसंत…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २४
कविता – ऋतु वसंत… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
=1=
क्या कविता-गीत लिखूँ तुम पर, तुम ख़ुद हो गीत-ग़ज़ल साथी
तुम कली हो तुम ख़ुद तितली हो, तुम ख़ुद हो खिला कमल साथी ll
=2=
इतना है प्रेम प्रगाढ़ मेरा, जीना तुम बिन दुश्वार मेरा
धड़कन कहती दिल भी कहता, तुम बिन हर पल है विकल साथी ll
=3=
अपना सर्वस्व न्यौछावर कर, तुम साथ निभाना सुख-दुःख में
फ़िर देखो सजा-सुसज्जित सा, अपने ख़्वाबों का महल साथी ll
=4=
शर्मो-हया के दल-दल में, देखो मैं दला सा जाता हूँ
बातें मैं न कर पाऊँगा, अब तुम ही करो पहल साथी ll
=5=
हो बहार जीवन में संगी, रहे न शिकवा-गिला कोई
हर लम्हा ख़ुशनुमा सजीला, जीवन जाए सम्हल साथी ll
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जब दौर बुरा आये कोई, तब साथ मेरे रहना ऐसे
ज्यों परछाई रहती है, संग रहना तुम हर पल साथी ll
=7=
मुस्कान चाँदनी जैसी है, स्वर कोई मधुर कोकिला सा
दुनिया में चीज़ हसीं जितनी, लगती है तेरी नकल साथी ll
=8=
तुम हो सतरंगी इन्द्रधनुष, मेरे जीवन नभ-मण्डल पर
हुआ बसेरा मन में जबसे, दिल में मची हलचल साथी ll
=9=
ओझल यूँ न होना नज़र से, बस यही इल्तिज़ा है मेरी
दूर हुई तुम कुछ क्षण को भी, ये दिल न जाए मचल साथी ll
=10=
विकट क्षणों में जीवन के तुम, सदा निभाना साथ मेरा
बनना ऐसा मेरा सहारा, ज्यों ग्रंथों की रहल साथी ll
=11=
ऋतु वसंत आयी मादकमयी, रंग पर्व रंगीला
दिल निश्छल यह प्रेम अटल, यह इश्क़ रहे अव्वल साथी ll
=12=
फाल्गुन मादक मस्त अहा, रंगीला नशीला महीना
महुआ ज्यों मदमत्त होके, सब दूर करें अटकल साथी ll
=13=
जीवन क्यों बदरंग रहे, इस रंग-बिरंगी होली में
‘राजेश’ रंग दूँ गाल तेरे, तू साथ मेरे अब चल साथी ll
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© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
शासकीय कॉलेज़ केवलारी
संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





