कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्
(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)
कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने प्रवीन ‘आफ़ताब’ उपनाम से अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है नव वर्ष पर आपकी अप्रतिम रचना “पिता कोई पैकेज नहीं होते…”।
पिता कोई पैकेज नहीं होते… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆
☆
दोपहर के तीन बज रहे थे।
पुणे का श्मशान घाट धूप से झुलस रहा था।
आसमान चुप था।
धरती चुप थी।
और हवा में तैरती चंदन की गंध मानो किसी अदृश्य विदाई का संगीत बन गई थी।
एक काली चमचमाती कार आकर रुकी।
दरवाज़ा खुला।
आर्यन उतरा।
चौंतीस वर्ष।
लंदन की बहुराष्ट्रीय कंपनी में निदेशक।
विदेशी वेतन।
डॉलर में पैकेज।
कंधे पर महँगा लैपटॉप बैग।
कान में ब्लूटूथ।
कलाई पर ऐसी घड़ी, जिसकी कीमत उसके पिता की पूरे वर्ष की पेंशन से अधिक थी।
उसने घड़ी देखी।
तीन बजकर पाँच मिनट।
रात नौ बजे की फ्लाइट थी।
कल बोर्ड मीटिंग।
वह तेज़ कदमों से भीतर आया।
सब व्यवस्था हो चुकी थी।
लकड़ियाँ सजी थीं।
पंडित मंत्रों के पन्ने उलट रहे थे।
और सफेद कपड़े में लिपटा एक शांत शरीर पड़ा था।
वसंतराव।
अठहत्तर वर्ष।
पिता।
आर्यन कुछ पल ठिठका।
चेहरे पर झुर्रियाँ थीं, पर वही करुण मुस्कान अब भी अटकी थी।
वही चेहरा — जो कभी देर रात तक दरवाज़े पर बैठा उसका इंतज़ार करता था।
वही हाथ — जिन्होंने गिरते समय उसे उठाया था।
एक आँसू निकला।
उसने तुरंत पोंछ दिया।
गला साफ किया।
“सब जल्दी हो जाएगा ना? मेरी फ्लाइट है। कल बहुत ज़रूरी प्रेज़ेंटेशन है। प्लीज़ समय पर करा दीजिए।”
पास खड़े अनिरुद्ध ने उसकी ओर देखा।
वे अंतिम संस्कार की व्यवस्था करने वाली संस्था से थे।
उनकी आँखों में प्रश्न था —
क्या पिता के लिए भी समय स्लॉट तय होता है?
पर उन्होंने कुछ नहीं कहा।
मंत्र शुरू हुए।
घंटी बजी।
आर्यन सब करता रहा — जैसे किसी प्रोजेक्ट की प्रक्रिया पूरी कर रहा हो।
बीच-बीच में घड़ी देखता रहा।
फिर वह क्षण आया।
उसने अग्नि दी।
लपटें उठीं।
धीरे-धीरे ऊँची होने लगीं।
धुआँ ऊपर उठा —
जैसे वर्षों का परिश्रम, त्याग, भूख, चिंता और अनकहे सपने आकाश में विलीन हो रहे हों।
कुछ देर बाद आर्यन ने वॉलेट निकाला।
“कितना बिल है? अस्थि-विसर्जन भी आप करवा दीजिए। मैं दोबारा नहीं आ पाऊँगा। जितना भी है, अभी ट्रांसफर कर देता हूँ।”
अनिरुद्ध शांत स्वर में बोले —
“आपका बिल पहले ही जमा है।”
आर्यन ठिठका।
“किसने किया?”
“सात वर्ष पहले आपके पिता स्वयं आए थे। तब चल भी मुश्किल से पाते थे।
उन्होंने पूछा था —
‘सब व्यवस्था ठीक रहेगी न? मेरे बेटे को कोई परेशानी न हो।’
उसी दिन उन्होंने अग्रिम भुगतान कर दिया।
और यह पत्र छोड़ गए थे।”
लिफाफा उसके हाथ में था।
हाथ काँप रहे थे।
उसने पत्र खोला।
प्रिय आर्यन,
मुझे पता है तुम बहुत व्यस्त हो।
तुम्हारी दुनिया बड़ी है।
मीटिंग, लक्ष्य, प्रस्तुति, यात्राएँ।
मेरी खबर सुनकर तुम्हें सबसे पहले छुट्टी और टिकट की चिंता होगी।
और बेटा, यह स्वाभाविक है।
मैंने तुम्हें इसलिए पढ़ाया था कि तुम आगे बढ़ो।
तुम्हारी उड़ान मेरे सपनों की ऊँचाई है।
एक बूढ़े शरीर के कारण अपने काम में बाधा मत आने देना।
इसलिए मैंने सब पहले ही कर दिया है।
यदि आ सको तो अच्छा।
न आ सको तो भी कोई शिकायत नहीं।
बस एक छोटी सी बात —
जब तुम छोटे थे और सड़क पार करते थे,
मैं तुम्हारा हाथ कसकर पकड़ता था।
आज जब तुम मुझे अग्नि दो,
तो तुम्हारा हाथ ढीला न पड़े।
और हाँ —
जल्दी लौट जाना।
तुम्हारी मीटिंग छूटनी नहीं चाहिए।
तुम्हारा
बाबा
पत्र समाप्त हुआ।
आर्यन के हाथ से वॉलेट गिर पड़ा।
राख में धँस गया।
पर उससे कहीं गहरा कुछ और धँस चुका था —
उसका अभिमान।
उसकी उपलब्धियाँ।
उसकी तथाकथित सफलता।
वह वहीं घुटनों के बल बैठ गया।
“बाबा…!
मैं कमाता रहा…
और आप मेरे लिए मरने तक की तैयारी करते रहे…!”
उसकी आवाज़ फट गई।
“मैंने आपके लिए समय नहीं निकाला…
और आपने मेरी सुविधा के लिए अपनी मृत्यु तक नियोजित कर दी?”
लपटें तेज़ हो उठीं।
मानो उत्तर दे रही हों।
उस रात आर्यन ने फ्लाइट रद्द कर दी।
मीटिंग छूट गई।
फोन बंद कर दिया।
वह पूरी रात वहीं बैठा रहा —
जलती चिता के सामने।
पहली बार उसने घड़ी नहीं देखी।
क्योंकि समय अब उससे छूट चुका था।
उसे समझ में आया —
सुविधाएँ प्रीपेड हो सकती हैं।
बीमा पॉलिसी प्रीपेड हो सकती है।
अंतिम संस्कार की व्यवस्था भी प्रीपेड हो सकती है।
पर पिता का प्रेम कभी प्रीपेड नहीं होता।
वह उधार नहीं होता।
वह अनुबंध नहीं होता।
वह पैकेज नहीं होता।
वह अनंत होता है।
निःस्वार्थ होता है।
अपरिमेय होता है।
संस्था चिता सजा सकती है।
अस्थियाँ बहा सकती है।
पर जो हाथ बचपन में थामे गए थे —
उनका मूल्य कोई नहीं चुका सकता।
और जब संतानों की संवेदना सूख जाती है,
तब वे सफल तो रह जाते हैं —
पर पुत्र नहीं रह पाते।
पिता सचमुच
कोई पैकेज नहीं होते…!
☆
~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’
© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्
पुणे
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






बेहतरीन यथार्थ मार्मिक अभिव्यक्ति
मार्मिक अभिव्यक्ति
बहुत बढ़िया। आज की ज्वलंत समस्या। एनआरआय युवा ऐर उनकी राह देखती आँखें। पर ये भी एक सच है कि हम ही हमारे बच्चों की आँखों में सपने डाल देते हैं।
पर यहां का पिता नयी सदी का समझदार व्यावहारिक पिता है।
रघुवंशी जी ने बहुत रुला दिया. आंसू थम नहीं. प्रतिक्रिया देना असंभव है।