श्री संतोष नेमा “संतोष”
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके – मीरा पर कुछ दोहे… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९४ ☆
☆ मीरा पर कुछ दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
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मीरा मानक प्रेम की, जिनका पावन प्यार
लड़ती रहीं समाज से, मानी कभी न हार
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कृष्ण प्रेम में डूब कर, लोक लाज दी छोड़
संतों के सत्संग से, आया नूतन मोड़
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मीरा सी दीवानगी, मधुर प्रेम का राग
इस जग में दूजा नहीं, मीरा-सा अनुराग
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स्वामी समझें कृष्ण को, मन में प्रेम अपार
मीरा सुध-बुध भूलकर, करतीं जय जयकार
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रसिक बिहारी में रमी, करतीं नृत्य कमाल
मन मथुरा तन द्वारिका, मीरा के ये हाल
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वृंदावन-सा है हृदय, बहे प्रेमरस धार
मनमोहन मन में बसे, यही एक शृंगार
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मीरा ने जग की कभी, करी नहीं परवाह
साधक मोहन की बनूँ, यही एक थी चाह
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कृष्णमयी लगता रहा, मीरा को संसार
जित देखें उत कृष्ण ही, दिखते थे हर बार
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हे मनमोहन हमें भी, शरण लीजिए आप
मन में हो ‘संतोष’ धन, करूँ सदा ही जाप
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© संतोष कुमार नेमा “संतोष”
वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार
आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





