श्रीमती शशि सराफ
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘गोपी संग रास रंग…‘।)
☆ शशि साहित्य # १५ ☆
कविता – गोपी संग रास रंग… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
ओ रे कान्हा, तू कितना सयाना,
जाने कब गगरी में मेरी,
तूने केसर रंग मिलाया,
मैं तो हूं निपट अनाड़ी,
भोली भाली, सीधी सादी,
जान सकी ना, तेरी शरारत,,
तुझे अपनी और देख निहारत,
मैं शरमाई, मैं सकुचाई,
धड़कते दिल, लरजते हाथों से,
मटकी उठा, कमर से लगा, फिर सर पर चढ़ाई,,
मैं चल दी पनघट से घर की राह,
ना पा सकी, तेरे मुस्काते नैनन की थाह,,
होले से फिर कुछ तूने फेंका,,
हाये, , महकते फूल या कोई प्रेम निशानी ???
लेकिन, अरे रे रे रे,,
कंकड़ी मोहे मारी,
गागरिया फोड़ डाली,,
केसर के रंग में रंग गई,
मेरी चोली चुनर सारी…
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© श्रीमती शशि सराफ
जबलपुर, मध्यप्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






