श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जीवन में सम्मान की”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २१३ – जीवन में सम्मान की ☆
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जीवन में सम्मान की, सबको रहती चाह।
अगर दाम है जेब में, आसाँ है तब राह।।
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सम्मानों का है सजा, मनचाहा बाजार।
छोटा बड़ा मझोल है, बोली लगें हजार।।
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हर आयोजक चाहता, लक्ष्मी का वरदान।
सरस्वती को तब मिले, मन चाहा सम्मान।।
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संयोजक की चाहना, श्रोता दर्शक मंच।
संसाधन बिन शून्य है, कैसे होगा लंच।।
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अतिथि मंच पर बैठते, पहले तो नाराज।
करतल ध्वनि जब गूँजती, मन में बजते साज।।
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मंचों पर जो बैठते, संस्थाओं में ज्येष्ठ।
या वरिष्ठ हों आयु में, तो ही होते श्रेष्ठ।।
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वक्ता अपने ज्ञान की, घुटी पिलाता घोल।
श्रोता सारे मौन हो, शब्द सुने अनमोल।।
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ज्ञानवान होते वही, बोलें मधुमय बोल।
श्रोताओं की दाद से, प्रवचन दें दिल खोल।।
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दर्शक श्रोता सामने, लेते हैं आनंद।
आपस में वे तौकबलते, खट्टा मीठा कंद।।
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कुछ तो केवल चाहते, अच्छा खासा लंच।
तृप्ति भाव पर ही कहें, अति उत्तम है मंच।।
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हम तो बस यह चाहते, ऐसा हो सम्मान।
स्वाभिमान सबका बचे, नैतिकता का मान।।
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गुणवानों की कद्र हो, उनका हो गुणगान।
हम तो नहीं है चाहते, बंद करें सम्मान।।
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लक्ष्मी माँ कुछ कृपा कर, दे ऐसा वरदान।
राह सुगमता से मिले, सबका हो कल्यान।।
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ज्ञानी का सम्मान हो, यही रचें संसार।
स्वागत हो जयकार हो, है उत्तम सुविचार।।
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© मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
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