स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘उजास ही उजास‘ की एक भावप्रवण कविता – कुछ दिनों से…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७६ – कुछ दिनों से – १
(काव्य संग्रह – उजास ही उजास से )
कुछ दिनों से
अजब घटनाएँ घट रही हैं।
परिचितों के पाँवों में
बिमाइयाँ फट रही हैं
लोग
बड़ी आतुरता से / बड़े गौर से
देखते हैं मेरा चेहरा / मेरा मुख
शायद कोशिश करते हैं
मन की इबारत को पढ़ने की
जिसे कहते हैं दुख।
मुख और में दुख
कोई तालमेल नहीं
किसी के मुख को पढ़ लेना
दुख को हर लेना
हँसी खेल नहीं।
ज्यादा हुआ/ तो
हँसा जा सकता है
किसी विपत्ति में फँसे पर,
तिनके की जगह
फेंका जा सकता है पत्थर
धार में धँसे पर
बड़ी अलग सी बातें हैं
दुख में रहना
दुख को सहना
और
चुप रहना!
क्रमशः…
© डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





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