श्रीमती शशि सराफ
(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मनवा बैरी…’।)
☆ शशि साहित्य # १५ ☆
कविता – मनवा बैरी… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
हृदय हो रहा वैराग्य का,
ढूंढ रहा शून्य में विस्तार का,
दौर है आज और अभी में जीने का,
पाल रहा सपना जन्म-जन्मांतर का,
दुनिया ठहरी निपट निराली,
क्यों ढूंढ रहा खुद अपना सा,
अति वृहद विशाल जगत में,
क्यों रचे है, स्वयं की दुनिया का,
पल पल बदलती दुनिया में,
ठीक नहीं, तटस्थ हो जाना तेरे कदमों का,
दुश्वार मगर बहुत यह काम,
खुद को समझा लेने का..
खुशियां भर लो जीवन में,
अल्प समय है जीने का…
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© श्रीमती शशि सराफ
जबलपुर, मध्यप्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




