स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं।

आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘उजास ही उजास‘ की एक भावप्रवण कविता – कुछ दिनों से।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७७ – कुछ दिनों से – २ – ✍

(काव्य संग्रहउजास ही उजास से )

हाँ दुख को पढ़ना भी एक कला

आजकल ये रिवाज

आम हो चला है

कि लोग

दूसरों के दुख का ढोल

अपने गले में टाँग लेते हैं

और

सूचनात्मक बाग देते हैं।

सवाल दुख-सुख का नहीं

सवाल है नियत का

अगर नियत में खोट है

तो फूल से छूना भी चोट है।

मैंने नहीं सीखा

दुख में दीन होना

शोभा नहीं देता

मनु राजा के बेटे को

कौड़ी के तीन होना/ हीन होना।

अरे, दुख आया है

केमिक

तो सहेंगे

हम भवानी कवि के वंशज

रोकर नहीं

गाकर कहेंगे।

दुख में गाना

कि

पागलपन नहीं/ कलेजे का काम है,

दुनिया है दुखदाता

है

और सुखदाता

पुरुषार्थी पुरुषोत्तम राम है।

आज के जमाने में राम का नाम

पुरानी मूर्तियों की तरह म्यूजियम में

रखा जाता है

और स्मगल के काम आता है

खैर कोई कुछ करे

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Dr Bhavna Shukla
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सादर नमन