श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता कविता का साया…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५७ ☆

☆ # “कविता का साया…” # ☆

मैं सुबह-सुबह घर से घूमने निकलता हूं

धीरे-धीरे नपे तुले कदमों से चलता हूं

तब वह भी मेरे साथ साथ चलती है

 

गार्डन में घूमते हुए

प्रकृति के नजारों को आंखों से चूमते हुए

सूर्य की कोमल किरणों से लिपटकर

कलियों को धीरे-धीरे उमलते हुए

मैं देखता हूं

कुछ देर बेंच पर बैठता हूं

वह भी बैठती हैं

जब मैं उठकर चलता हूं

वह भी मेरे साथ-साथ चलती है

 

जब वॉकिंग से घर आता हूं

फ्रेश होकर अखबार पढ़ता हूं

चाय की चुस्कियों के संग

समाचार की सुर्ख़ियों को पढ़कर

अपने विचार अपनी सोच गढ़ता हूं

अपनी दुनिया में पहुंच जाता हूं

तब भी वह मेरे साथ-साथ वहां भी चलती है

 

दिनभर कुछ ना कुछ करते रहता हूं

कभी पढ़ते रहता हूं

कभी लिखते रहता हूं

कभी घर के कामों में व्यस्त रहता हूं

और जब मैं आराम करता हूं

तब वह भी मेरे साथ-साथ आराम करती है

 

शाम को मित्रों के साथ

टी” पॉइंट पर

बैठकर गप्प मारते हुए

चाय पीते हुए

संसार की समस्याओं पर

आपसी विचार विमर्श

डिबेट करते हुए

शाम रात में ढलती है

तब मैं घर जाने को निकलता हूं

तब भी वह मेरे साथ साथ चलती है

 

रात में बिस्तर पर सोते हुए

जो बातें मन में उतरती है

आंखों के आगे आती है

दिल को झकझोरती है

तब भी वह मेरे साथ साथ होती है

 

फिर मैं अचानक उठकर

टेबल लैंप की रोशनी में

कुछ सोच कर

कलम उठाकर

लिखने बैठता हूं

तब वह मेरे कलम के

शब्दों के साथ-साथ चलती है

कागज पर उतरती है

नई रचना बनती है

वह मेरा साया नहीं

वह मेरी प्रिय कविता होती है

वह मेरी प्रिय कविता होती है /

 

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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