मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

कविता – “तुम” शब्दाकोष हो मेरी प्रेयसी…!!!!!
मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
(हिंदी वर्णमाला के अक्षरों के क्रम पर एक कविता लिखने के मेरे प्रयास का पठन और समीक्षा कीजिये – मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग)
अकस्मात
आना उसका,
इतराते हुए
ईमान को झकझोरनते हुए
उसका वो
ऊंची आकांक्षाओं में खेलना
ऋषभ(श्रेष्ठ) का बिंब बनकर उभरना
एतबार को झुठलाते हुए
ऐसी विवशता में डालते हुए
ओस की शीतलता में सराबोर
औचित्य को चुनौती देती
अंक में भर के अनुराग लिये
अ: को विभेदन अत: से करती
कब अवतरित हुई
खनकती ध्वनि के संग
गरज के न बरसती
घटा बन के घिर आई
चपल हिरनी की तरह
छल से आग्रह करतीं
जब सामने हो साक्षात ही
झरती धारा के रूप में
टपकती बूंद बनकर
ठहर जाती हो हृदय की पाती पर
डालकर पहरा नज़रों का
ढाल दी है कोई मूरत साक्ष्य की
तब भी थकती न थी कोई प्रतीक्षा
दसों अरमान लिए
धड़कनों की ज़ुबाँ को झुठलाती
नूर बनके इस चांदनी में
प्रणय को स्वीकारना
फूलों के इस चमन में
बहार हो, ठहरो ज़रा
भंवरे को रिझाती
मुझे तरसाती
ये तुम ही थीं
रातों की स्याही में
लौ बनकर जुनून की
वन जैसी निस्तब्धता में
शीशे से मेरे दिल को
षोडश (सोलह) श्रृंगार से चूर करतीं
सदा देकर मुझे
हद से गुज़रने को उकसाती
क्षितिज पर बना
त्रिकाल (भूत,वर्तमान, भविष्य) का
ज्ञानसागर की “तुम” शब्दाकोष हो मेरी प्रेयसी…!!!!!
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© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






वाह, भई वाह!
साधुवाद!
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