सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
☆ स्मृतिशेष आशा भोसले विशेष – संगीत कभी मरता नहीं – कवि: अज्ञात ☆ संकलन – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे☆
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सिर्फ़ खून का रिश्ता नहीं था उनका,
सुरों का, साँसों का, और समय का रिश्ता था।
चार साल का फ़ासला,
एक 1929 में जन्मी, दूसरी 1933 में…
लेकिन जब गाती थीं, तो लगता था
जैसे एक ही आत्मा दो आवाज़ों में उतर आई हो।
फिर समय ने भी जैसे उनकी कहानी को
एक अजीब-सी समरूपता में ढाल दिया—
चार साल का ही अंतर…
एक ने 2022 में विदा ली,
दूसरी 2026 में…
दोनों ने 92 साल की उम्र देखी,
दोनों ने रविवार को आख़िरी साँस ली,
और दोनों ने उसी जगह से अलविदा कहा,
ब्रीच कैंडी अस्पताल…
क्या यह महज़ संयोग था?
या नियति ने भी उनकी जुदाई को
एक लय, एक ताल में बाँध दिया था?
लता मंगेशकर और आशा…
ये सिर्फ़ नाम नहीं थे,
ये भारतीय संगीत की दो धड़कनें थीं।
एक ने भक्ति, दर्द और पवित्रता को स्वर दिया,
दूसरी ने जीवन, शरारत और जुनून को।
लेकिन अंत में…
दोनों की कहानी एक ही सच्चाई पर आकर ठहरती है,
संगीत कभी मरता नहीं।
आज अगर आशा ताई (मराठी में बड़ी बहन) होतीं,
तो शायद मुस्कुराकर अपनी लता ताई से यही कहतीं,
“दीदी, अब मैं भी आ रही हूँ…
वहीं, जहाँ सुर कभी ख़ामोश नहीं होते…”
और शायद कहीं…
आसमान के उस पार,
फिर से शुरू हो गया होगा एक अनंत रियाज़।
दो बहनों का,
दो दिग्गजों का…
जो अब इतिहास नहीं,
अमर गूंज बन चुकी हैं।
🙏🏻
साभार – सोशल मीडिया
#AshaBhosle
कवि – अज्ञात
संकलन – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
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९८२२८४६७६२
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