आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका ज्ञानवर्धक आलेख – छंद शाला।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७७ ☆
☆ आलेख – छंद शाला ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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छंद वाचिक होते हैं। वेदों की रचना कह-सुन-याद रखकर ही हुई। इसलिए वैदिक ज्ञान/ ऋचाएँ सदियों तक श्रुति-स्मृति पर आधारित रहीं।
कंठ से निकलनेवाली ध्वनि को उच्चार कहते हैं।
उच्चार दो तरह के होते हैं।
कम समय में बोले जानेवाले उच्चार को लघु तथा उससे दो गुने समय में बोले जानेवाले उच्चार को दीर्घ/गुरु कहते हैं। छंद रचना के लिए लघु उच्चार को इकाई या १ तथा गुरु उच्चार को २ गिना जाता है।
अपवाद स्वरूप कुछ ध्वनियाँ जैसे ॐ का उच्चार काल ३ होता है।
वैदिक ज्ञान बढ़ जाने पर उसे मौखिक रूप से याद रखना संभव न रहा। तब हर ध्वनि के लिए एक संकेत बनाया गया, इसे अक्षर (जिसका क्षरण न हो) कहा गया।
एकाधिक अक्षर मिलाकर विशिष्ट अर्थ अभिव्यक्त करनेवाले शब्द बने। अक्षर और शब्द आरंभ में वाचिक थे। शब्दों के सम्मिलन से वाक्य बने। अक्षरों व शब्दों के लयबद्ध वाचन से छंद और छंदों के प्रयोग से पद्य/काव्य (पहेली,छंद, गीत आदि) रचना हुई। वाक्यों के संयोजन से गद्य (कहावतों, मुहावरों,वार्ता, कथा, कहानी आदि) का सृजन हुआ। लोक गीत व लोक कथाओं का विकास इसी तरह हुआ। इस काल तक तुरंत रचना करनेवाले आशु कवि/आशु कथाकार ही भाषा और साहित्य का विकास कर रहे थे। लोक गायकों ने लोकगीत तथा लोक कथाकारों ने लोककथा विधाओं का विकास किया।
वनवासी/आदिवासी समूहों की भाषाएँ और साहित्य इसी काल में विकसित हुआ। लोक साहित्य के विकास में महिलाओं तथा पुरुषों की भागीदारी आरंभ से ही बराबर रही। इस दौर में घर, पनघट, खलिहान, चौपाल आदि तथा जन्म-मरण, दैनिक जीवन, ऋतु परिवर्तन। पर्व-त्योहार, मिलना-बिछुड़ना, सुख-दुख, आदि ऐसे स्थल व कारण थे जहाँ स्वानुभूति सृजन का रूप धारण कर लेती थी।
कालांतर में मानव ने खेती करना सीखा और खेतों के निकट झोपड़ी बनाकर रहने पर ग्राम्य सभ्यता का विकास हुआ। खेतों में फसलों की रक्षा करने के लिए बनाए गए मचानों पर खड़े कृषक बहुधा सवेरे अथवा शाम को प्रकृति दर्शन करते हुए या अपने एकांत को मिटाने के लिए कुछ ध्वनियों का लयबद्ध उच्चारण कर जोर से गाते थे, कहीं दूर कोई दूसरा कृषक उस पंक्ति को सुनकर बार-बार दोहरा कर उसी लय में अपने शब्द रखकर दूसरी पंक्ति गा देता था, फिर कोई तीसरा और चौथा व्यक्ति अपनी पंक्ति जोड़ देता था। ऐसी पंक्तियों में उच्चार क्रम, उच्चार काल तथा पंक्ति के अंत में समान ध्वनियाँ हुआ करती थीं। ऐसी दो पंक्ति की रचना को दोपदी, तीन पंक्ति की रचना को त्रिपदी”, चार पंक्ति की रचना को *चौपदी इत्यादि नाम दिए गए। इस समय तक रचनाकार समझदार किंतु निरक्षर (अक्षर लिखने की कला से अपरिचित) थे, अशिक्षित नहीं। यह परंपरा कबीर, रैदास, घाघ, भड्डरी, मीराबाई आदि तक देखी जा सकती है। भाषा और साहित्य के विकास में योगदान करनेवाले अनेक रचनाकार सीखने-सिखाने में सक्षम अर्थात सुशिक्षित किंतु निरक्षर थे।
मानव द्वारा रेत पर अँगुलियों से बिंदु, रेखा, वृत्त आदि अंकित करने पर लिपि का विकास आरंभ हुआ। रेत पर बनाई आकृति मिटने का समाधान पेड़ों की पत्तियों के रह को टहनियों के माध्यम से पत्थरों पर अंकित करने की विधि से किया गया जिसका परिणाम शैल चित्रों/शिलालेखों के रूप में आज भी उपलब्ध है। अक्षरों तथा अक्षरों के अर्थ युक्त सम्मिलन से बने शब्दों को पत्थरों पर अंकित करना लिपि के विकास का महत्वपूर्ण चरण है। कालांतर में शब्दों को लंबे समय तक न सड़नेवाले पत्तों पर भी लिखा गया। हमें प्राचीन ग्रंथ ताड़ पत्रों तथा भोज पत्रों पर लिखे हुए मिलते हैं।
स्मरण रहे कि लिपि के विकास के बहुत पहले वाचिक (बोल-चाल की) भाषा तथा छंद लोक में प्रचलित हो चुके थे।
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© आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
१९.११.२०२५
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