श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बंटी और बबली…“।)
अभी अभी # ९८२ ⇒ आलेख – बंटी और बबली
श्री प्रदीप शर्मा
कितना प्यारा नाम है बंटी और बबली ! बंटी है जहां, बबली है वहां। वैसे जरूरी नहीं कि हर बालक का नाम बंटी ही हो, और भी बहुत नाम हैं लाड़ प्यार वाले। कहीं उसे प्यार से बण्डू कहते हैं तो कहीं बिट्टू। जहां बिट्टू है, वहां फिर बिट्टी भी होगी। कहीं उसे बाबू कहते हैं तो कहीं बाबा। हमारा बाबा ही मराठी भाषियों का बाला अथवा बाळा है। बड़े होकर ये ही बाला साहेब ठाकरे और बाला साहेब देवरस कहलाते हैं। कौन जानता था बचपन का बाबू, बड़ा होकर बाबू जगजीवनराम निकलेगा।
जब बंटी की बात चली है तो क्यों न सबसे पहले “आपका बंटी” की ही बात कर ली जाए। जिन्होंने मन्नू भंडारी की कालजयी कृति आपका बंटी पढ़ी है, वे उसके बारे में मुझसे अधिक ही जानते होंगे, लेकिन जिन पाठकों ने यह उपन्यास नहीं पढ़ा, वे मेरा अभी अभी छोड़कर, पहले आपका बंटी पढ़ें।।
कोई भी उपन्यास हाथों हाथ नहीं पढ़ा जाता, लेकिन सन् १९७० में प्रकाशित यह उपन्यास आज के समय में भी कितना प्रासंगिक है, यह तो इस उपन्यास को पढ़ने के बाद ही जाना जा सकता है। इस उपन्यास के दो पक्ष हैं, एक स्त्री पुरुष के टूटते संबंध और बंटी की मनोव्यथा। बाल मनोविज्ञान पर हिंदी साहित्य में यह उपन्यास एक मील का पत्थर है।
फिल्म बंटी और बबली का, मन्नू भंडारी के आपका बंटी से कोई संबंध नहीं होते हुए भी समाज में बढ़ते तनाव, असुरक्षा और अपराध की पृष्ठभूमि में इन पात्रों के मनोविज्ञान का अध्ययन भी जरूरी हो जाता है। माता पिता का अपना व्यवहार किसी बच्चे की जिंदगी अगर बना सकता है, तो तबाह भी कर सकता है।।
एक लेखक कभी अपनी कहानी नहीं कहता। उसके आसपास बिखरी घटनाएं, दास्तान, लोगों की आपबीती, उनके कन्फेशन्स उसे अपनी कलम चलाने के लिए बाध्य कर देते हैं। हर लेखक मसीहा नहीं होता। या तो आवारा मसीहा होता है अथवा स्वदेश दीपक की तरह जिंदा ही किसी सलीब पर टंगा पड़ा होता है।
मन्नू भंडारी इतनी अकेली भी नहीं थी उस समय। राजेंद्र यादव के अलावा मोहन राकेश और कमलेश्वर एक परिवार की तरह ही तो थे। कहानियां लिखी जाती थीं, गर्मागर्म बहस चलती रहती थी और पकौड़ियां भी तली जाती थी। ममता और रवींद्र कालिया भी तब कहां अलग थे, इस लेखक समुदाय से।।
यही सच है, पर तो फिल्म रजनीगंधा बन भी गई, लेकिन आपका बंटी आज भी वहीं अकेला खड़ा है। और फिल्म में भी उसका साथ दिया भी तो किसने बबली ने। लेकिन दोनों मिलकर केवल एक मनोरंजक फिल्म ही बना पाए, इसके अलावा और कुछ नहीं।
धर्मवीर भारती भी एक समय इसी स्कूल के थे। लेकिन बाद में उन्होंने धर्मयुग में इतिहास रचा, तो कमलेश्वर सारिका में जा बैठे और राजेन्द्र यादव ने हंस का दामन थाम लिया। यह भी बुरा नहीं। जब चुक जाओ, तो संपादक बन जाओ। लेकिन यह जरूरी तो नहीं ! मनोहर श्याम जोशी ने साप्ताहिक हिंदुस्तान छोड़ने के बाद ही तो कसप, कुरू कुरू स्वाहा और हरिया हरक्यूलिस जैसी रचनाएं दी हैं।।
धर्मवीर भारती के उपन्यास पर आधारित एक फिल्म बनी थी ” एक था चंदर, एक थी सुधा”। यह फिल्म बनी जरूर, लेकिन दर्शकों को देखने को मिली मनोज कुमार की गुनाहों का देवता, जिसका भारती जी के उपन्यास से कोई लेना देना नहीं था।।
एक अच्छे लेखक का सृजन कभी सुख का सृजन नहीं हो सकता। क्योंकि लेखकीय सृजन में भोगा हुआ यथार्थ है, पीड़ा है, संत्रास है। लेखकीय पात्र बार बार अवचेतन में चिल्लाते हैं, कराहते हैं, लेखक को विचलित भी कर देते हैं। फेयरवेल टू आर्म्स जैसे उपन्यास का नोबेल पुरस्कार विजेता अर्नेस्ट हेमिंग्वे यूं ही खुद को गोली मारकर आत्म हत्या नहीं कर लेता।
किसी ने सही कहा है ;
बहुत कठिन है
डगर पनघट की।
आपका बंटी की कहानी है
हर परिवार की,
घट घट की।
लेकिन क्या करे बेचारी बबली।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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