सुश्री मंजिरी “निधि”
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता ‘श्री राम ‘।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # ९ ☆
आलेख – केरलम का मुकुट रत्न ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
भारत भिन्न भिन्न संस्कृतियों का देश है l और यही कारण है कि यहाँ का हर धर्म, हर जाति एक दूसरे की संस्कृति से परिचित है l
भारतीय संस्कृति में माना जाता है कि चातुर्मास में भगवान सो जाते हैं जिसे हम देव शयनी ग्यारस कहते हैं और भगवान देव उठनी ग्यारस पर उठ जाते हैं l देव शयनी ग्यारस के पूर्व केरलम राज्य त्रिशूर पूरम नाम का उत्सव मनाता है l कहते हैं कोच्ची महाराज के समय से इस उत्सव को मनाने की परम्परा चली आ रही है l यह उत्सव केरलम की संस्कृति के भिन्न पहलुओं को दर्शाता है साथ ही यह वार्षिक उत्सव इस राज्य की संस्कृति में चार चांद भी लगा देता है l
जब चन्द्रमा और फाल्गुनी नक्षत्र एक रेखा में आते हैं उस दिन से इसकी शुरुवात होती है l यह सात दिन का उत्सव होता है l इसकी विशेषता हाथियों की परेड होती है l इसमें करीब 30-35 गजराज सम्मिलित होते हैं l सभी सोने के जाल से, आभूषणों से सजे होते हैं l
त्रिशूर के पश्चिमी क्षेत्र से भगवान श्रीकृष्ण और त्रिशूर के पूर्वी क्षेत्र से माँ भगवती ऐसे पूरे दस मंदिर इस उत्सव में आमंत्रित होते हैं l ये सभी अपने अपने देवदूतों अर्थात गजराजों पर बैठकर शोभायात्रा के साथ वड़क्कूनाथन मंदिर में विराजमान हो जाते हैं l
एक एसी संस्कृति जहाँ हम हाथी को गणेश के रूप में भी पूजते हैं, हर अच्छे कार्य की शुरुवात हम गणेश वंदन से करते हैंउसी तरह इस उत्सव की शुरुवात भी एक राजसी हाथी से होती है l यह हाथी अपनी पीठ पर भगवान अयप्पा का फोटो रख वड़क्कूनाथन मंदिर के दक्षिणी दरवाजे को हौले से अपने पैर से खोलता है और ये उत्सव शुरु हो जाता है l उसी समय आकाश में सुंदर आतिशबाजी की शुरुवात होती है जो सात दिन तक निशा को होने से रोकती है l वड़क्कूनाथन मंदिर भगवान शिवजी का है l यह उत्सव भगवान शिव को समर्पित होता है l पूरे सात दिन पंच पकवानों का नैवैद्य लगाया जाता है l
15-15 गजराज मंदिर के पूर्वी और पश्चिमी दरवाजे पर सजधज कर परेड के लिये खड़े होते हैं l इन पर बैठने वाले छत्रधारी अपने हाथों में सजे हुए खम्बे लिये होते हैं जो की सुपाडी के पेड़ से बने होते हैं l इन खम्बो पर सुंदर सुंदर चमकीले रंगों से सजे रेशम के कपड़ों के बने छाते होते हैं l साथ में मोरपंखो से बने पंखे होते हैं l सभी गजराज ड्रम, तुरही, पाइप, झाँज, कोम्बू इन पाँच वादयों की धुन पर एकएक कर आगे आते हैं और छत्रधारी इन रंगबिरंगी छातों की अदला बदली करते हैं l साथ में लोगों की तालियों की गदगडाहट की आवाज भी शामिल हो जाती है l
इस उत्सव के सातवे दिन आतिश बाजी के साथ ही सभी देवता एक दूसरे से विदा लेते हैं l पुनः अपने वाहनों पर सवार होकर अपने अपने मंदिरों में प्रतिष्ठित हो जाते हैं l
इस उत्सव में हिन्दु ही नहीं अपितु सभी धर्म के लोग शामिल होते हैं जो एकता का प्रतीक दर्शाता है l
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© सुश्री मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈


