सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – मधु मिलन राग…।
रचना संसार # ९३ – गीत – मधु मिलन राग… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
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क्यों कलंकित लोग करते,
हैं सदा अनुराग को।
गा न पाती कोकिला है,
मधु मिलन के राग को।।
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काँपती है हर कली भी,
अब भ्रमर गुंजार से।
तोड़ बंधन प्रीत के सब,
झाँकते क्यों द्वार से।।
कौमुदी कब तक बचेगी,
दानवों के वार से।
दग्ध हिय प्रतिबिम्ब तेरा,
ताकता है बाग को।
*
सुप्त फेरे प्रीत के हैं,
हारती है दामिनी।
ठग गया है काम तन को,
है बिलखती कामिनी।।
राह प्रियतम नित निहारे,
प्रेम आकुल भामिनी,
पूछती है केश वेणी।
तन लगे इस दाग को
*
रो रहा है देख अम्बर,
टूटते विश्वास को।
छल गया है चाँद छलिया,
फिर मिलन की आस को।।
दे रहे आवाज आँसू,
जा रहे मधुमास को।
नित गरल के घूँट पी कर,
देखते बस झाग को।।
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© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)
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