श्री एस के कपूर “श्री हंस”
☆ “श्री हंस” साहित्य # २०३ ☆
☆ गीत ।। बदरंग सोना तपकर तराश कर खरा बनता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆
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बदरंग सोना तपकर तराश कर खरा बनता है।
सूख रहा पौधा भी रोज सींच कर हरा बनता है।।
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अच्छा भलाआदमी भी जल-भुन के खाक हो जाता है।
अहंकार में पलते-पलते आदमी राख हो जाता है।।
आचरण में शिक्षा को उतार आदमी ज्ञान भरा बनता है।
बदरंग सोना तपकर तराश कर खरा बनता है।।
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सुख समृद्धि में नहीं संघर्ष कष्ट में आदमी निखरता है।
कठनाईं में भी आगे बढ़ कर ही आदमी संवरता है।।
अपने बुरे वक्त से लड़ कर आदमी निर्भिक बनता है।
बदरंग सोना तप कर तराश कर खरा बनता है।।
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अगर रास्ते जिद्दी तो मंजिल पाने की जिद बढ़ जाती है।
अगर चलते ही रहे तो मुश्किल खुद ही घट जाती है।।
जन्म काफी नहींअपने कर्म से इंसान धरा पर बनता है।
बदरंग सोना तप कर तराश कर खरा सोना बनता है।।
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© एस के कपूर “श्री हंस”
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