श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “संगत पंगत की …“।)
अभी अभी # ९८६ ⇒ आलेख – संगत पंगत की
श्री प्रदीप शर्मा
संगत पंगत की कर लीजे ! संतों का सत्संग तो हमने बहुत कर लिया, संतों का रंग भी हम पर चढ़ भी गया, और इतना चढ़ा कि हमें धर्म और राजनीति दोनों की समझ आ गई।
आज के संत पलायन वादी नहीं, वे पहाड़ों में कंदराओं में जाकर नहीं बैठ जाते, वे दीमक को मौका ही नहीं देते, कि वे मधुमक्खी की तरह देह से चिपककर, उनके तपस्वी, ओजस्वी, आभायुक्त और विरक्त शरीर का अलंकार बनें।
वे भी निष्काम कर्म का पालन करते हुए, इस मायावी जगत में रहकर मानव मात्र के कल्याण के लिए कृत संकल्पित रहते हैं।
ग्राम्य सभ्यता ने ही हमें समय पर उठना बैठना, चलना फिरना सिखाया। हम प्रकृति के इशारों पर सूर्योदय के पहले ही सुख की नींद त्याग, दिशा मैदान के लिए निकल जाते थे। चलते चलते ही नीम और बबूल की पतली टहनी तोड़ी और कोलगेट टूथ ब्रश तैयार।
रफ और टफ वातावरण में नित्य कर्म, हमारी दैनिक दिनचर्या का ही एक अंग था। बुजुर्गों के साथ, प्रसाधन का संसाधन, मात्र धोती लोटा होता था, कुएं, बावड़ी और नदियों की कोई कमी नहीं थी।।
बस समझिए, वहीं से पंगत की संगत शुरु हो गई थी।
संयुक्त परिवार के सभी बच्चे एक साथ बैठकर भोजन करते थे। नानी, दादी और ताऊजी हमें उंगली पकड़कर शादियों में जीमने ले जाते थे। अपना लोटा ग्लास ही हमारा निमंत्रण पत्र होता था।
नर्सरी केजी, की ट्रेनिंग के पश्चात् हम शहर आ गए, गली, मोहल्लों और बाड़ों में बस गए। सिगरी न्यौते के बुलावे के लिए, नाई घर पर आता था। बाहर साइकिल पर से ही मौखिक निमंत्रण दे, चला जाता था। समय, स्थान और प्रयोजन। हमें तो सिर्फ जीमने से मतलब था।।
घरों में तब रसोई गैस का आगमन नहीं हुआ था। चूल्हे के साथ सिगड़ी का भी उपयोग शुरू हो चुका था। सिगरी न्यौते का अर्थ, घर में उस रोज सिगड़ी नहीं जलेगी। घर के सभी सदस्य, जिनमें अतिथि देव, साले बहनोई सभी शामिल होते थे, सादर आमंत्रित थे।
आज जिसे हम भंडारा कहते हैं, वही पहले पंगत कहलाती थी। जब तक एक पंगत नहीं उठ जाती थी, दूसरी नहीं लगती थी।
बाकायदा पानी और बुहारी से धर्मशाला के फर्श को स्वच्छ किया जाता था। फिर बारी आती थी, पत्तल दोने की। पत्तल उल्टी सीधी होती थी, उसे परखकर सीधा किया जाता था। दोने फूटे ना हों, इसका विशेष खयाल रखा जाता था। पहले रायता फैलता था, आजकल जान बूझकर फैलाया जाता है।।
पंगत का अपना एक मेनू होता था। आलू का साग, पूड़ी, नुक्ती सेंव और लड्डू। मौसम के हिसाब से खीर अथवा रायता। आप जितना खाते, उतनी ही अधिक आपकी मनुहार होती। जो ठूंस ठूंस कर खाते थे, उनकी तो बात ही कुछ और थी, लेकिन जो नहीं खाते थे, उन्हें भी ठूंस ठूंस कर खिलाया जाता था। लेकिन तब के लोग कुछ अलग ही मिट्टी के बने थे, वे पंगत में ना करना जानते ही नहीं थे।।
पंगत का एक अनुशासन होता था। नमः पार्वती पतये हर हर महादेव के जयघोष के साथ, पहले अन्नदेव को प्रणाम किया जाता था, उसके बाद ही पंगत शुरू होती थी। सामूहिक संगत का आनंद आता था पंगत में। पंगत के बीच में से नहीं उठा जाता था। जब सबका भोजन हो जाता था, उसके बाद ही पंगत से उठकर हाथ धोया जाता था।
लगता है, अब पंगत और संगत के दिन लद गए। बफैलो की तरह खड़े खड़े खाना ही हमारी नियति बन गया है। सात्विक भोजन का स्थान मोमोज, मंच्यूरीअन, पिज्जा और पास्ता ने ले लिया है। हम कहते हैं गिद्ध भोज, और उसमें शामिल भी होते हैं।
कितने बदल गए आजकल मजबूरी में महात्मा गांधी।।
वैसे जब आयोजन बड़े बड़े रिजॉर्ट और पंच सितारा होटलों में होंगे, तो काहे की पंगत। लेकिन हां, वहां संगत के लिए कॉकटेल पार्टियां हैं न। वैसे भी लाखों की ज्वैलरी, हजारों के सूट, टाई और चमचमाते जूते पहन, कौन किसी पंगत का रुख करता है। यह मन्नू भंडारी का महाभोज है, किसी पंगत की संगत नहीं ..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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