स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – सदा स्वार्थ-व्यवहार …” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २६७ ☆
☆ सदा स्वार्थ-व्यवहार… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
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आजादी के पहले भारत में था अंग्रेजों का राज।
लूट रहे थे वे हम सबको दीन दुखी था यहाँ समाज ॥
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तिलक और गाँधी ने देखे सपने, चाहा देशी राज।
कष्ट सहे, समझाया सबको, लाई चेतना और स्वराज ॥
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उनके उस निस्वार्थ त्याग का सुख हम भोग रहे हैं आज ।
किन्तु खेद है उन्हें भुला कर स्वार्थमुखी हो चला समाज
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सदा स्वार्थ-व्यवहार जगत् में होता है दुख का आधार ।
धन सुख का आधार नहीं है, वह तो है ममता औ’ प्यार ॥
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जो चरित्र का पतन दिख रहा यह है बड़ी हमारी हार ।
बहुत जरूरी जन हित में फिर सुधरे हम सबका व्यवहार ॥
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© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी भोपाल ४६२०२३
मो. 9425484452
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





