श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५२ ☆
☆ कविता ☆ काव्य कथा विथिका ~ अलग अलग हैं रंग ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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(खंड दो )
गांव से भोलू शहर आ गया, खूब लगी थी भूख ।
गोरा चेहरा लाल हो गया, कड़क कटीली धूप ।।
काम किया पूरा दिन भोलू, नहीं मिली मजदूरी।
हाथ पांव जोड़ा बेचारा, कह डाला मजबूरी ।।
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बच्चे मेरे भूखे साहब, आधे पैसे दे दो ।
ईश्वर तेरा भला करेगा, विनती मेरी सुन लो।।
पर मलिक था क्रूर कुटिल, डांट के उसे भगाया ।
पत्नी भी ना कोई कम थी, नहीं तनिक थी माया ।।
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खोटी किस्मत लेकर भोलू*, घर को किया प्रस्थान ।
पाँव सड़क पर आगे बढ़ता, कहीं था उसका ध्यान
मन में भोले भोले कहता, भोलू खुद को भूला ।
गमछे से आँशु को पोछे, पीठ पर लटका झोला ।।
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भोलू भोलू सुनो न मुझको, छत से आई आवाज ।
एक पुरानी मालकिन उसकी, खड़ी थी छत पर आज ।।
दो सौ रूपये पकड़ो भोलू, ले आना तुम खाद ।
बगिया सुखी, फूल रो रहे, पौध हुए बर्बाद ।।
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इसको भी पकड़ो तुम भोलू, लाल मिठाई खास ।
बात बताओ, मेरे भोलू, क्यों हो अधिक उदास ।।
भोलू की आँखें भर आई, देख जगत का रंग।
यही देव-दानव दोनों है, अलग-अलग है ढंग।।
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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
दिनांक 22-05-2026
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





