श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बुरी नजर दूर हट (थू थू थू)।)

?अभी अभी # १००९ ⇒ आलेख – बुरी नजर दूर हट (थू थू थू) ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सन् १९६१ में एक फिल्म आई थी ससुराल जिसका एक गीत बड़ा लोकप्रिय हुआ था, तेरी प्यारी प्यारी सूरत को, किसी की नजर ना लगे, चश्मे बद्दूर ! तब मेरी सूरत कोई खास प्यारी नहीं थी, लेकिन मैं तब भी नजर का चश्मा लगाता था। चश्मे का संबंध नजर से जरूर है लेकिन किसी चश्मा लगाने वाले का चश्मे बद्दूर से कोई लेना देना नहीं। लोग मुझे चश्मे बद्दूर सिर्फ इसलिए कहते थे, क्योंकि मैं चश्मा लगाता था।

अंग्रेजी और उर्दू में वैसे भी हमारा हाथ तंग ही रहता है। हमारे फिल्मी शायर इसीलिए इतने लोकप्रिय हो जाते हैं। कर्णप्रिय संगीत का श्रोता, शब्दों के फेर में नहीं पड़ता, वह गायक की मधुर आवाज और धुन में ही उलझ जाता है। शायर हसरत जयपुरी ने तो बस गीत लिख दिया और लोगों की ज़ुबान पर रातों रात यह गीत चढ़ गया, चश्मे बद्दूर ! जिसका आम भाषा में अर्थ होता है, बुरी नजर, दूर हट।।

जहां नजर है,  वहां चश्मा है, और अगर सूरत प्यारी हुई तो उस ओर नजर उठ ही जाती है और अनायास मुंह से निकल ही जाता है,  चश्मे बद्दूर। शायर ने अपना काम बखूबी किया, चश्मे बद्दूर का अर्थ भी बताया, किसी की नजर ना लगे। लेकिन रहा सहा काम हम जैसे नासमझों ने कर दिया। जहां किसी प्यारी सी सूरत पर चश्मा नज़र आया, उसे चश्मे बद्दूर कहना शुरू कर दिया।

आज पहले जैसी स्थिति नहीं। लोग पढ़ लिख गए हैं,  गुलज़ार की शायरी पढ़ते हैं और जगजीत सिंह को सुनते हैं, और समझकर उसका आनंद भी लेते हैं।

बात नजर की हो रही है।

बहुत दिनों से हिंदी के ही एक शब्द का प्रयोग मुझे विचलित कर रहा है। कोई आश्चर्य नहीं अगर आज का शायर कुछ इस तरह का गीत लिख मारे ;

तेरी प्यारी प्यारी सूरत को

किसी की नजर ना लगे

थू थू थू !

यह क्या वाहियात मजाक है,  आपको अनफ्रेंड किया जाता है। मैने भी जब पहली बार किसी के मुंह से थू थू थू सुना, तो मुंह फेर लिया। थू शब्द में क साइलेंट है। स्वच्छ भारत के पहले जहां दीवारों पर लिखा रहता था, यहां थूकना मना है, वहां पहले,  मना,  शब्द रंगबिरंगी पिचकारियों के बीच छुप जाता था और बाद में पूरी हिदायत को पान और पान पराग की बौछारों से नहला दिया जाता था।।

कोविड काल का मास्क अभी भी पूरी तरह से हमारे चेहरों से उतरा नहीं है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य भी है कि हमारे थूक में बीमारियों के कीटाणु रहते हैं, इसलिए जिन लोगों के मुंह से बोलते वक्त फूल झरने की जगह थूक के छींटे स्प्रे मारते हैं, उनसे दो गज की दूरी बनाए रखें। लेकिन उन शुभचिंतकों का क्या किया जाए जो आपको बुरी नजर से बचाने के लिए पहले थू थू थू करते हैं और बाद में सफाई पेश करते हैं।

आप अन्यथा ना लें, लेकिन स्टार प्लस की अनुपमा भी बहुत थू थू थू करती है और उसी की देखा देखी मैंने आज की युवा पीढ़ी को भी पहले किसी की तारीफ और बाद में चश्मे बद्दूर की तरह थू थू थू करते देखा है। पहले थू, बाद में थू थू और उसके बाद थू थू थू, इस तरह नफरत से मोहब्बत की जानिब,  तय की हमने मंजिलें। हमारी मोहब्बत को किसी की नजर ना लगे। चश्मे बद्दूर, थू थू थू।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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