श्री संजय भारद्वाज
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३४२ ☆ कंफर्ट ज़ोन…
प्रकाशन के अपने व्यवसाय के संदर्भ में काग़ज़ के थोक विक्रेताओं के बाज़ार में हूँ। यह मुख्य शहर की एक संकरी गली है। इमारतों के पुनर्विकास के बाद ऊपरी मंज़िलों पर फ्लैट बने हुए हैं और नीचे दुकानें हैं। अपना काम समाप्त कर निकलने ही वाला हूँ कि सड़क पर कुत्तों के ज़ोर-ज़ोर से भौंकने के स्वर गूँजने लगे हैं।
देखता हूँ कि किसी फ्लैट में रहने वाली एक महिला अपने पालतू कुत्ते को घुमाने निकली हैं। कुत्ते के गले में बंधे पट्टे से लगी साँकल का एक सिरा महिला के हाथ में है। उसके दूसरे हाथ में डंडा है। इसी कुत्ते को देखकर और महिला के हाथ के डंडे के चलते गली के कुत्ते उनसे कुछ दूरी रखकर ही भौंक रहे हैं। गली के कुत्तों को आवारा या स्वतंत्र कहने का विकल्प पाठक अपने-अपने वैचारिक अधिष्ठान के अनुसार चुन सकते हैं।
तथापि इस आलेख का विषय आवारा या स्वतंत्र कुत्तों का भौंकना नहीं है। विषय है पालतू कुत्ते का उनकी ओर दृष्टि उठाकर भी न देखना। वह अपनी मालकिन के आश्रय में साँकल की परिधि में यहाँ- वहाँ कुछ सूँघता, कहीं-कहीं मुँह मारता चला जा रहा है। मेरी विचार-प्रक्रिया के केंद्र में इस घटना के संदर्भ में पालतू कुत्ते का व्यवहार है। क्रिया की प्रतिक्रिया, प्रकृति का नियम है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक न्यूटन ने इसे थर्ड लॉ ऑफ़ मोशन के द्वारा सिद्ध भी किया है। यह नियम कहता है कि किसी भी क्रिया के लिए हमेशा एक समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है।
इस घटना में पालतू कुत्ता, गली के कुत्तों के भौंकने की प्रतिक्रिया में भौंक नहीं रहा है। सोचता हूँ, पराधीनता से मिलता लाभ भी शनै:-शनै: सुविधा के गणित में बदल जाता है। यदि इस पालतू के स्थान पर गली का कुत्ता होता तो प्रतिरक्षा में भौंकता, उस गली में अपना स्थान बनाने के लिए लड़ता या अपने को निर्बल पाकर भाग खड़ा होता, जो भी करता, कोई न कोई प्रतिक्रिया अवश्य देता। यद्यपि हम उपेक्षा को भी प्रतिक्रिया कह सकते हैं पर प्राणी के बौद्धिक स्तर को देखते हुए यह तर्कसंगत नहीं लगता। यहाँ तो साँकल के संरक्षण में भौंकने की प्रक्रिया विस्मृत हो जाना अधिक तार्किक जान पड़ता है।
परजीविता के इस उदाहरण में अपने स्वामी से प्राप्त भोजन, पोषण, सुविधा ने कुत्ते के लिए एक कंफर्ट ज़ोन तैयार कर दिया है। कंफर्ट ज़ोन भीतर ही भीतर मानसिक ग़ुलामी के लिए तैयार कर देता है।
मानसिक गुलामी की भयावता पर लगभग दो दशक पूर्व लिखी अपनी कविता स्मरण हो आई। ‘मन के हारे’ शीर्षक की यह कविता कहती है,
समय ने ली करवट / पिंजरा अब खुला है,
कैसा मोह है / पंछी अब भी उसी में पड़ा है,
आयु बीती स्वतंत्र होने की प्रतीक्षा में,
आकाश मापने की मनीषा में,
पर-जैसे-जैसे / समय बीतता है,
तन के साथ / मन भी ग़ुलाम हो जाता है,
पंछी हो या मनुष्य / मानसिक ग़ुलामी भयावह है !
यूँ भी आसानी से अपना कंफर्ट ज़ोन बिरले ही छोड़ पाते हैं। जबकि तथ्य यह है कि धरती की कक्षा में बने रहने का मोह हो तो अंतरिक्ष में प्रवेश नहीं किया जा सकता। यात्रा लंबी करनी हो, सोद्देश्य करनी हो तो कंफर्ट ज़ोन छोड़ने का साहस करना ही होगा। अपनी प्रकृतिगत विशेषताओं, अपने सिद्धांतों और तदनुकूल आचरण के साथ ‘कदापि समझौता नहीं’ के तत्व को अपनाना ही होगा।
सार है कि अपने मूल के साथ अपने अस्तित्व के अभिन्न संबंध को अनुभव करो और गंतव्य की ओर बढ़ो। यदि ऐसा कर सके तो जीवन रीतने का दुख नहीं अपितु सार्थक बीतने का संतोष होगा। अस्तु!
© संजय भारद्वाज
(प्रात: 6:01 बजे, 27 जून 2026)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
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