डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है  अग्रज डॉ सुरेश  कुशवाहा जी  की  हमें जीवन के कटु सत्य से रूबरू कराती एक विचारणीय कविता  “भीतर का बसन्त सुरभित हो………। )

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य  # 37 ☆

☆ भीतर का बसन्त सुरभित हो……… ☆  

 

स्वयं हुए पतझड़, बातें बसन्त की करते

ऐसा लगता है-

अंतिम पल में ज्यों, दीपक कुछ अधिक

चमकता है।

 

ऋतुएं तो आती-जाती है

क्रम से अपने

पर पागल मन देखा करता

झूठे सपने,

पहिन फरेबी विविध मुखौटे

खुद को ठगता है।

ऐसा लगता है…….

 

बचपन औ’ यौवन तो

एक बार ही आये

किन्तु बुढापा अंतिम क्षण तक

साथ निभाये,

साथ छोड़कर, मन अतीत में

व्यर्थ भटकता है।

ऐसा लगता है……….

 

स्वीकारें अपनी वय को

मन और प्राण से

क्यों भागें डरकर

हम अपने वर्तमान से

यौवन के भ्रम में जो मुंह का

थूक निगलता है

ऐसा लगता है……….

 

भीतर का बसन्त

सुरभित हो जब मुस्काये

सुख,-दुख में मन

समरसता के गीत सुनाए,

आचरणों में जहाँ शील,

सच औ’ शुचिता है।

तब ऐसा लगता है।।

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर, मध्यप्रदेश

मो. 989326601

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