श्री जगत सिंह बिष्ट
(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)
🌷लघुकथा ☘️ तीन फिटनेस सर्टिफिकेट और एक अंतिम सत्य 🌺
आज सुबह सैर के लिए निकला तो देखा कि एक अख़बार का हॉकर रामचरितमानस की चौपाइयाँ गुनगुनाते हुए बड़ी तन्मयता से अख़बार बाँट रहा था। भोर की ताज़ी हवा में तुलसीदास की वाणी का वह मधुर स्वर कुछ ऐसा घुला कि कदम अनायास ही ठिठक गए।
मैंने मुस्कराकर कहा, “भाई, यह तो बहुत सुंदर बात है। सुबह-सुबह प्रभु का स्मरण भी हो रहा है और पूरी लगन से अपना काम भी।”
बातों-बातों में उसने बताया कि वह कभी फ्रीस्टाइल रेसलिंग करता था। स्वस्थ रहने के लिए आज भी रोज़ सुबह अख़बार बाँटता है और दिन में अपना दूसरा काम करता है। फिर उसने मेरी ओर देखा। मेरे सफ़ेद होते बालों और उम्र का सम्मान करते हुए बोला, “सर, आप इस उम्र में भी बिल्कुल फिट हैं!”
मन ही मन मैंने उस युवक को आशीर्वाद दिया।
थोड़ा आगे बढ़ा तो पार्क के बाहर एक फिटनेस ट्रेनर मिल गया। मुझे दूर से आते देखकर बोला, “आपको देखकर ही अच्छा लग जाता है। आपने अपने आपको बहुत अच्छी तरह मेंटेन रखा है।”
अभी इस प्रशस्ति का सुख पूरी तरह आत्मसात भी नहीं कर पाया था कि पार्क के भीतर एक योग प्रशिक्षक ने भी लगभग वही बात दोहरा दी—“आप हमेशा प्रसन्न रहते हैं, और इस उम्र में भी एकदम फिट हैं।”
बस, फिर क्या था! पंद्रह मिनट के भीतर तीन-तीन फिटनेस सर्टिफिकेट मिल चुके थे। मन मयूर-सा नाच उठा। प्रसन्नचित्त, हल्के कदमों और कुछ अधिक ही सीधी कमर के साथ घर लौटा।
घर पहुँचते ही यथार्थ ने बड़ी आत्मीयता से मेरा स्वागत किया।
स्वर गूँजा—“पार्क में ठीक से वॉक क्यों नहीं करते? बार-बार झूले पर जाकर बैठ जाते हो। नियमित योग भी नहीं करते। तोंद निकलने लगी है, कंधे भी झुकने लगे हैं। थोड़ा फिटनेस पर ध्यान दो। ट्रैकिंग पर भी चलना है!”
मैंने बिना किसी प्रतिवाद के सब कुछ शांत भाव से सुना।
आख़िर बाहर की दुनिया हमें उत्साह देती है, और घर की दुनिया हमें वास्तविकता से जोड़े रखती है।
ऐसे अवसरों पर मैं स्थितप्रज्ञ हो जाना ही श्रेयस्कर समझता हूँ।☺️
© श्री जगत सिंह बिष्ट
साधक
A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.
≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈





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