श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६५ ☆

☆ आलेख ☆ ~ धरती की वेदना ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

(भीषण त्रासदी के कारक )

आसमान से उतर रहे देवताओं को देखकर धरती माँ चिल्लाई,

नहीं नही…भाई अभी इसकी जरूरत नहीं है l अभी मुझ पर उतना अत्याचार नहीं है जितना कहा जा रहा है l अभी भी मै अनेकानेक, नेक इंसानों को लोंगो की मदद करते देख रही हूँ। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है l बस पीड़ा एक बात की है कि क्या सड़क, क्या बाजार, क्या स्कूल, क्या अस्पताल सब धक्कम – रेल हो रही है,

 मैं हिलती जा रही हूँ

मै बुरी तरह से काँप रही हूँ

आने वाले खतरे को भाँप रही हूँ

कॉलोनी में गाड़ियों का रेला, रेल बनता जा रहा है। मोहल्ले की लड़ाई, किचन बर्तन से उतरकर, गाड़ियों की पार्किंग तक चली आयी है। रोडवेज की एक बस निकली नहीं कि दूसरी भर जा रही है। जहाँ देखो भीड़ ही भीड़।

राशन की लाइन में भीड़,

मॉल- वाटर पार्क में भींड,

ऑफिस दफ्तरों की भींड,

रोडवेज रेलवे स्टेशनो में भींड,

शेर सपाटा-तीर्थ यात्रा करने वालों की भीड़

टूरिस्ट हैं या तथाकथित तीर्थ यात्रियों

मै नही जानता लेकिन लगी हुई है भीड़,

भीड़ ही भीड़, भीड़ इतनी कि मैं खुद अपनी नीड ढूढ़ रही हूँ। रोज बा रोज नए-नए अस्पतालों के खुलने के बावजूद भी अस्पतालों में भीड़ ही भीड़ है। ओ.पी.डी. से ओ.टी. तक की भीड़, एक्स रे -अल्ट्रासाउंड सेंटर की भीड़, पैथोलॉजी में खून निकलवाने वालों की भीड़, अस्पताल के अगल बगल खून चूसने वाले दलालों की भीड़।

इतना ही नहीं टूरिज्म की आड़ में सभी जा रहे हैं झुंड के झुंड पहाड़ों पर। वहाँ भी अब शांति नहीं, क्योंकि ये सारे पदयात्री नहीं।

गाड़ी, घोड़ा, मोटर बग्गी सब कुछ लेकर जाना है। इन लोगों के सुख सुविधा में कोई कमी न हो, वोट बैंक बरकरार रहे इसलिए विकास की आड़ में, काटते चले जा रहे हैं पहाड़ों को। बना रहे हैं रोज एक से एक बड़ी सड़के। मेरे पहाड़ों को तोड़ने के लिए जब आती है इनकी भारी भरकम मशीने, तब शांत पहाड़ चिघाड़ उठते हैं। रोने लगती है उनकी आत्माएं। काट -काट कर गिरा देते हैं देवदार और चीड़ के वृक्षो को। ये वृक्ष जो कि जकड़े रहते हैं अपनी जड़ों से इन पहाड़ों को। पहाड़ों पर पहुंचकर बनाते हैं आलीशान होटल। पहुँच जाती है ढेर सारी गाड़ियाँ। इनके धुओं से बढ़ जाता है यहाँ का टेंपरेचर। टूट के गिर पड़ते हैं, विशाल और विशाल ग्लेशियर। टूट जाती है प्रकृति की बनाई हुई झील की दीवारें और बहता हुआ निकल पड़ता है जानलेवा शैलाब। तब होती केदारनाथ और नेपाल जैसी भीषण त्रासदी

मारी जाती है ढेर सारी मानवता। अनाथ हो जाते हैं छोटे-छोटे बच्चे, बेसहारा हो जाते हैं बुजुर्ग माँ बाप।

यह सब देखकर मैं हिल उठती हूँ। फूट फूट कर रोती हूँ। आखिर मै करूँ तो क्या करूँ, ये तो मानते नहीं है।

पर यह सब होता ही भी है इन्हीं के कारण। इन लोगों ने तो एकदम हलचल बचा कर रख दी है। क्या धरती क्या आसमान, सब जगह भीड़ बेकाबू है, इनकी मनमानी जारी है। एक दिन आसमान भी मुझे रो कर कह रहा था कि तेरे बेटों ने यहां भी गंदगी बचा कर रख दी है। ढेर सारे रॉकेट, ढेर सारे उपग्रह क्या बोलते हैं, सैटेलाइट.. मेरे स्वच्छ शांत नीले आँगन में छोड़ रखा है l मैं बिलख रही हूँ। वायुयानों की तो बात ही छोड़ो, ये लाखों फतिंगो की तरह से इधर से उधर फुदक कर रहे हैं l इन्होने मेरा जीवन हराम कर दिया है।

हे देवगण ! मैं सिर्फ अपने बच्चों को बड़े प्यार से अपने गोद में पालना चाहती हूँ, और पालती भी हूँ। लेकिन इनके लिए शेष कार्य तो आप लोग ही करते हो l आप में से कोई धन के देवता हो, कोई ऐश्वर्या और यश के देवता हो, कोई जल के देवता हो, कोई ऊर्जा के देवता हो, कोई बुद्धि विवेक के देवता हो तो बस इतनी दया करो इन्हें इन्हे धन -दौलत सबकुछ दो पर बुद्धि विवेक कुछ ज्यादा ही दो, कि मेरे संकट में पड़े प्राण बच सके।

है देवगण ! मेरी पीड़ा के दो बड़े मूल कारण है, जो मुझे पीड़ित कर रहे हैं, मैं इसी विषय पर सोचती रहती हूं और आपसे कहती हूँ..

आप लोग मेरे इन पुत्रों से कहो कि-

‌ये लोग बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण रखें।

‌प्रकृति और पर्यावरण का संरक्षण करें।

अगर ये लोग आपकी बात मानकर ऐसा करते हैं तब जाकर मेरी खुशी वापस लौटेगी.

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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