श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है “मनोज के दोहे – कविता ”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २३४ ☆
☆ मनोज के दोहे – कविता ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
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कविता संग की दोस्ती, थामा उसका हाथ।
मुझसे जब-जब रूठती, तब-तब हुआ अनाथ।।
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प्रश्न करे जग बावरा, लिखता जो दिन रात ।
कौन पढ़ेगा यह सभी, तेरे दिल की बात ।।
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कुछ अपनेे ही कोसते, देख मेरा यह काज।
प्रतिपल समय गवाँ रहा, आती है ना लाज।।
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तन की ताकत के लिये, पौष्टिक हैं आहार ।
मन की शक्ती के लिये, जीवन में सुविचार ।।
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कविता कभी न चाहती, मानवता पर घात ।
जिसमें जग का हित रहे, उसे सुहाती बात ।।
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मिटे विषमता देश की, अरू मानव मन भेद ।
प्रगति राह में सब बढ़ें, व्यर्थ बहे न श्वेद ।।
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जगे हृदय संवेदना, या बदले परिवेश ।
यही सोच कर लिख रहा, शायद बदले देश ।।
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© मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
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