श्री अशोक कुमार धमेंनियाँ  ‘अशोक’

(श्री अशोक कुमार धमेंनियाँ  ‘अशोक’जी साहित्य की सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। प्रकाशन – 4 पुस्तकें प्रकाशित 2 पुस्तकें प्रकाशनाधीन 3 सांझा प्रकाशन। विभिन्न मासिक साहित्यिक पत्रिकाओं में लघु कथाएं, कविता, कहानी, व्यंग्य, यात्रा वृतांत आदि प्रकाशित होते रहते हैं । कवि सम्मेलनों, चैनलों, नियमित गोष्ठियों में कविता आदि  का पाठन तथा काव्य  कृतियों पर समीक्षा लेखन। कई सामाजिक कार्यक्रमों में सहभागिता। भोपाल की प्राचीनतम साहित्यिक संस्था ‘कला मंदिर’ के उपाध्यक्ष। प्रादेशिक / राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कारों / अलंकरणों  से  पुरस्कृत /अलंकृत। आज प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर  एवं विचारणीय लघुकथा ‘बहू हो तो ऐसी‘। )

☆ लघुकथा  – बहू हो तो ऐसी ☆

रामसेवक ने सुबह-सुबह नहाया – धोया और प्रतिदिन की भांति पूजा करने मंदिर चले गए। रास्ते में सोचते जा रहे थे :-

“कल रात की सब्जी अच्छी ना होने के कारण भोजन से पेट नहीं भरा । खाने में दाल अथवा रसीली सब्जी होने पर सुविधा हो जाती है । दांत कमजोर हो गए हैं । सूखी सब्जी में अब  दाँत साथ नहीं देते । बहू से कहना उचित नहीं है।”

मंदिर से लौटकर घर आने पर रामसेवक सीधे भोजन पर बैठते थे । घर आने पर उन्हें थाली लगी मिली ।

थाली देखते ही सोचा – अरे, थाली में तो दाल,  सब्जी वगैरह सब कुछ है। सब्जी भी करेले की, जो मुझे बहुत पसंद है। राम सेवक ने कहा :-

“अरे बहू, घर में करेले तो थे ही नहीं । तुमने करेले की सब्जी कैसे बना डाली ? ”

“पापा! आपको करेले पसंद है ना । मुझे मालूम है रात में आपने भरपेट खाना नहीं खाया । आप जब मंदिर गए थे तो मैंने बाहर जाकर ठेले से करेले खरीदे ताकि आपको सब्जी पसंद आए और आप भरपेट भोजन कर सकें । शाम को आप क्या खाएंगे , यह भी बता दीजिए ताकि आपको खाने में असुविधा ना हो । ”

रामसेवक भावुक हो गए । उनकी आँखें नम हो गईं। उन्हें उनकी फिक्र करने वाली बहू जो मिली थी।

© अशोक कुमार धमेंनियाँ  ‘अशोक’

भोपाल म प्र

मो0-9893494226

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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A. K. Dhameniya
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जी धन्यवाद।