श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी अर्ध शताधिक अलंकरणों /सम्मानों से अलंकृत/सम्मानित हैं। आपकी लघुकथा  रात  का चौकीदार”  महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9वीं की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित। आप हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ  समय-समय पर अपनी अप्रतिम रचनाएँ साझा करते रहते हैं। आज प्रस्तुत हैं आपकी  एक अतिसुन्दर एवं विचारणीय कथा “खोई हुई चाबी…..”। )

☆  तन्मय साहित्य  #109 ☆

☆ कथा कहानी – खोई हुई चाबी…..

क्या सोच रहे हो बाबूजी! आज बहुत परेशान लग रहे हो ?

हाँ, देविका तुम्हें तो सब मालूम है आज पूरे दो साल हो गए सुधा को घर छोड़े हुए, रानू बिटिया जो हॉस्टल में रह रही है वह भी आठ वर्ष की हो गई, चिंता खाए जा रही है, आगे क्या होगा। अब तो ऑफिस से घर आने के नाम से ही जी घबराने लगता है।

सही कह रहे हो बाबू जी! मुझे भी नहीं जमता यहाँ आना, पर क्या करूँ, सुधा बीबी जी ने कहा है रोज यहाँ आकर साफ-सफाई और आपके भोजन पानी की व्यवस्था करने की, इसीलिए…..

अच्छा तो मतलब सुधा से तुम्हारी मुलाकात होती है?

नहीं बाबू जी – फोन पर ही आपके हालचाल पूछती रहती हैं वे और कहती हैं…,

क्या कहती है सुधा मेरे बारे में? यहाँ लौटने के बारे में भी कभी कुछ कहा है क्या, बताओ न देविका?

हाँ साहब कहती हैं कि, तेरे साहब का गुस्सा ठंडा हो जाएगा उस दिन वापस अपने घर लौट आऊँगी।

बाबूजी! ले क्यों नहीं आते बीबी जी को, छोटे मुँह बड़ी बात, मेरी बेटी जो सातवीं कक्षा में पढ़ती है न, स्कूल से आकर मुझे रोज पढ़ाने लगी है आजकल। कल ही उसने एक दोहा मुझे याद कराया है, आप कहें तो सुनाऊँ साहब, बहुत काम की बात है उसमें

यह तो अच्छी बात है कि, बेटी तुम्हें पढ़ाने लगी है सुनाओ देविका वह  दोहा

जी साब-

रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार।

रहिमन फिरी-फिरी पोईये, टूटे मुक्ताहार।।

अरे वाह! यह तो सच में बहुत ही काम का दोहा है।

बाबू जी अब मैं चलती हूँ, कल बेटी के स्कूल जाना है, इसलिए नहीं आ पाऊँगी।

तीसरे दिन देविका को डोर बेल बजाने की जरूरत नहीं पड़ी खुले दरवाजे से डायनिंग में रानू बेटी, सुधा बीबी जी और साहब जी बैठे जैसे उसी का इंतजार कर रहे थे।

आओ-आओ देविका! देखो परसों जो खोई  हुई चाबी तुमने दी थी न, उसने मेरे दिमाग की सारी जंग साफ करके इस घर का ताला फिर से खोल दिया।

कौन सी चाबी साब मैं कुछ समझी नहीं

अरे वही दोहे वाली चाबी जो हमारी नासमझी से कहीं खो गयी थी।

अच्छा तो हमारी खोई हुई चाबी ये देविका है सुधा ने अनजान बनते हुए कहा।

नहीं बीबी जी! असली चाबी तो फिर मेरी बेटी है जो खुद पढ़ने के साथ-साथ मुझे भी इस उमर में पढ़ा रही है।

ठीक है तो देविका अब से उस चाबी की सार संभाल और पूरी पढ़ाई की जिम्मेदारी हमारी है।

मन ही मन खुश होते हुए देविका सोच रही है आपके घर के बंद ताले को खोलने के साथ ही बेटी ने आज हमारे सुखद भविष्य का ताला भी खोल दिया है बाबूजी।

ऐसे ही बहुत महत्व रखती है जीवन में ये खोई  हुई चाबियाँ। 

 

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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