श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “षड्यंत्र की बू ।)

?अभी अभी # 443 ⇒ षड्यंत्र की बू ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ईश्वर ने हमें सोचने के लिए दिमाग, अच्छा बुरा देखने के लिए आँखें, सुनने के लिए कान और सूंघने के लिए एक नाक भी दी है।

हमारे सेंस ऑफ ह्यूमर की तरह ही हमारी सेंस ऑफ स्मेल यानी घ्राण शक्ति भी गज़ब की है। खुशबू बदबू की अच्छी पहचान तो हमें बचपन से है ही, हमारी पाक साफ नाक पर कभी कोई गंदी मक्खी भी नहीं बैठ सकती, और अगर कभी बैठी भी हो, तो वह यकीनन, मधुमक्खी ही होगी ;

हर हसीं चीज़ का मैं तलब्गार हूँ।

रस का फूलों का गीतों का बीमार हूँ।

कहने का मतलब यह कि- हम खुशबू और बदबू में आसानी से अंतर पहचान लेते हैं। दुनिया ओ दुनिया, तेरा जवाब नहीं। फूलों की खुशबू से किसे परेशानी होगी लेकिन कृत्रिम खुशबू हमारी पसंद नहीं। जो स्वाद के शौकीन हैं, उन्हें तो प्याज लहसुन में भी खुशबू नजर आती है।

लेकिन माफ करें, बदबू तो बदबू होती है।।

क्या कभी आपको नेकी में खुशबू नजर आई। अगर नेकी में खुशबू होती तो क्या लोग उसे दरिया में डालते। लेकिन हम तो सूंघकर ही समझ जाते हैं, आज रसोई में क्या पक रहा है। सराफे की गर्गागर्म सेंव और खौलती कढ़ाई में तैरते कचोरी समोसे की खुशबू राजवाड़े तक फैल जाती है। लेकिन अगर आपके आसपास कहीं ट्रेंचिंग ग्राउंड है, तो समझिए आपकी नाक कट गई।

सभी जानते हैं, बद अच्छा बदनाम बुरा की तरह ही, बू तो ठीक है, लेकिन बदबू बहुत बुरी है। हमने भी इस पहाड़ जैसी जिंदगी में कई तरह की बदबूएं झेली हैं, हमारी हालत क्या हुई होगी, केवल हम और हमारी नाक ही जानती है, फिर भी हमें आज तक किसी षड्यंत्र की बू नहीं आई।।

बू शब्द को आप गंध भी कह सकते हैं। गैस पर रखा दूध भी जल सकता है और सब्जी भी। जलने की भी एक गंध होती है, जिसे आप बू कह सकते हैं। केवल एक इंसान ही ऐसा है, जो ऊपर से तो शांत नजर आता है, लेकिन अंदर से पूरी तरह जल भुन जाता है। पारखी लोग पहचान ही लेते हैं, यह आग कहां कहां लगी है। आओ, थोड़ा और हवा दे दें। जली अच्छी जली।

बात षडयंत्र की बू की हो रही है। हमारी नाक इसके बारे में मौन है। वह इस मामले में अनावश्यक नहीं घुसना चाहती। उसे आज तक कभी किसी षडयंत्र की बू नहीं आई। हां कान जरूर यह कबूल करते हैं कि उन्हें इसकी भनक जरूर हुई थी।।

नाक का काम सूंघना है, चाहे खुशबू हो या बदबू, अनावश्यक अफवाहें फैलाना नहीं। इस काम के लिए ईश्वर ने आपको जुबां दी है, लगाओ जितना नमक मिर्ची लगाना हो, लेकिन आय विल नेवर पोक माय नोज इन दीज़ अफेअर्स। यानी इन मामलों में, मैं कभी व्यर्थ ही अपनी नाक नहीं घुसेड़ूंगा। जय हिंद !

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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